बम ब्लास्ट की ख़बर को तवज्जो देना हम पत्रकारों का फर्ज होता है .....लेकिन जब आम आदमी की सोचते है तो लगता है की अभी बहुत कुछ बाकी है..कही कोशी तो कही सिंगुर या कुछ और ??? .....पहले तो नही लेकिन अब जब भी घर से निकालता हूँ ...तो मन में एक अनजाना सा डर बना रहता है की कही ब्लास्ट न हो जाए ...बस में मेट्रो में या फ़िर कही भी हर उस शक्श को संदेह की नजरो से देखता हूँ जिसके हाथ में कोई बैग होता है ...... लगातार हो रही आतंकवादी गतिविधियों से हर आदमी अपने आप को डरा हुआ महसूस कर रहा है ..लेकिन लोगो कि दिनचर्या वैसे ही चल रही है जैसे पहले चल रही थी ...क्योंकि हम भारतीय है ,,,हमें कोई डिगा नही सकता ........लेकिन आम आदमी के लिए बदला है तो मन में एक डर .....
दोस्तों मै जिंदगी में कभी भी किसी से नही डरा हूँ ..... लेकिन किसी ब्लास्ट का शिकार हो के बे मौत नही मरना चाहता हूँ .... भगवान से यही दुआ है कि अगर कभी जान जाए तो देश की सेवा करते हुए जाए बस........
क्या खुफिया एजंसी इतनी निकम्मी हो गई है कि आम आदमी घर से निकलने के बाद वापस घर पहुच पाए ??????क्या ये मुमकिन है ????
Tuesday, September 23, 2008
Saturday, September 20, 2008
जांबाजी कही बिकती नही .......
जोश, जज्बा और देशभक्ति कही से खरीदी नही जाती .....ये पैदा होती है अपने देश की मिटटी के जुडाव से .....ये पैदा होतो है अपने परिवार के संस्कारो से ......
दिल्ली पुलिस के जांबाज पुलिस इंस्पेक्टर शहीद मोहन चंद शर्मा को शत - शत नमन....
जनवरी २००८ को राष्ट्रपति द्वारा मैडल लेते समय देखने वालो में कोई यह नही सोचा होगा की यह उनके लिए आखिरी मैडल होगा ....लेकिन आज यह सही है .....
कारगिल हो या फ़िर कोई और जंग या कोई पुलिसिया मुठभेड़ हर जगह ये आतंकवादी या क्रिमिनल मरते है तो अखबार , न्यूज़ चैनल अपनी भड़ास निकालने पहुच जाते है ...स्टोरी बानाने का सिलसिला चल पड़ता है .....लोग भीड़ बढाते है नारे बाजी करते है ..स्थानीय भी राजनीतिक रोटी सेकने पहुच जाते है .....
आज एक पुलिस का जवान शहीद हुआ है ....खबरों में इनकी शहादत को तव्वजो दी गई है लेकिन शायद इससे ज्यादा तव्वजो दी गई है उस ख़बर को जो मुठभेड़ से जुदा था ...हर पत्रकार बंधू अपने अखबार या चैनल के लिए सबसे पहले ब्रेकिंग करना चाहता था ....शायद नौकरी के लिए यह जरुरी भी था........
निवेदन है इन पत्रकार भाइयो से की इस जांबाज इंस्पेक्टर के परिवार की स्थिति के बारे में भी कुछ दिखाए ....
दिल्ली पुलिस के जांबाज पुलिस इंस्पेक्टर शहीद मोहन चंद शर्मा को शत - शत नमन....
जनवरी २००८ को राष्ट्रपति द्वारा मैडल लेते समय देखने वालो में कोई यह नही सोचा होगा की यह उनके लिए आखिरी मैडल होगा ....लेकिन आज यह सही है .....
कारगिल हो या फ़िर कोई और जंग या कोई पुलिसिया मुठभेड़ हर जगह ये आतंकवादी या क्रिमिनल मरते है तो अखबार , न्यूज़ चैनल अपनी भड़ास निकालने पहुच जाते है ...स्टोरी बानाने का सिलसिला चल पड़ता है .....लोग भीड़ बढाते है नारे बाजी करते है ..स्थानीय भी राजनीतिक रोटी सेकने पहुच जाते है .....
आज एक पुलिस का जवान शहीद हुआ है ....खबरों में इनकी शहादत को तव्वजो दी गई है लेकिन शायद इससे ज्यादा तव्वजो दी गई है उस ख़बर को जो मुठभेड़ से जुदा था ...हर पत्रकार बंधू अपने अखबार या चैनल के लिए सबसे पहले ब्रेकिंग करना चाहता था ....शायद नौकरी के लिए यह जरुरी भी था........
निवेदन है इन पत्रकार भाइयो से की इस जांबाज इंस्पेक्टर के परिवार की स्थिति के बारे में भी कुछ दिखाए ....
Friday, September 19, 2008
आतंकवाद में समाज की भूमिका ......
ब्लास्ट होता है लोग मरते है फ़िर स्थिति सामान्य होती है ...समय के साथ लोगो की दिनचर्या भी सामान्य हो जाती है......कुछ लोगो को पुरस्कार मिलता है तो कुछ लोगो को मुवावजा ...क्या इसके पीछे कोई यह सोचता है कि उन लोगो का क्या होता है जो इसके शिकार होते है ......क्या इन सब के बाद सुरक्षा व्यवस्था सुधर जाती है ? नही वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति चलती है .....आख़िर पुलिस क्या - क्या करे किस -किस को खंगाले .....जब भी कोई इनकाउंटर होता है तो कुछ समाज के ठेकेदार या फ़िर कहा जाय कि ये सामाजिक लोग ये जरुर कहते फिरेंगे कि ये इनकाउंटर पूर्व नियोजित था .....या कुछ मानवाधिकारी बंधू कूद के आ जायेंगे कहेंगे कि यह मानवाधिकार के खिलाफ है .......आख़िर में हम ये सवाल करते है कि ये सामाजिक लोग और मानवाधिकारी लोग उस समय कहा जाते है जब ब्लास्ट होता है ? पुलिस तो जो भी कर रही है कही न कही से जनता कि और देश की भलाई ही कर रही है .....अभी हाल में एक फ़िल्म आई थी वेडनेसडे जिसमे नसरुद्दीन शाह ने एक आम आदमी कि भूमिका निभाई थी ....वो आम आदमी मुंबई ब्लास्ट से परेशान था .....उसने आतंकवादियों के खिलाफ वो कदम उठाया जो आतंकवादी देश के खिलाफ उठाते है .....अगर आज देश का हर आम आदमी इस फ़िल्म के हीरो कि भूमिका निभाने लगे तो ......देश कि सुरक्षा एजंसियों का क्या होगा ?
Tuesday, August 26, 2008
आफिस में लेट .........
सुबह ७ बजे का अलार्म घनघनाया और मन भन्ना गया ....आज किसी तरह आफिस जल्दी पहुचना था.... इसलिए कोसा बहुत अपने आप को लेकिन उठना था क्योकि जीवन के जद्दोजहद से जूझना था .....फ़िर क्या था ....गिरते पड़ते पंहुचा आफिस के गेट पर मोबाईल में देखा कि नौ बज के पच्चीस मिनट हो गए बस कर दिया हस्ताक्षर .....शुरू हो गई नौकरी .......स्टोरी आईडिया और खबरों का दौर.....इसी बीच कुछ मित्रो को हो गई देर कर दिए लेट और हो गए रजिस्टर में अनुपस्थित .....कट गई तनख्वाह .....मरते क्या न करते वाली हाल ने उन्हें अन्दर से झकझोर दिया ....बेचारे कुछ देर तो बिताये आफिस में ...लेकिन दे गया धैर्य जबाब वो भी कोसे किस्मत को ......और निकल पड़े घर की ओर .....सिलसिला निरंतर जारी रहेगा .......दोस्त अभी तो स्टोरी बाकी है.....ये कहानी किसी भी आफिस की हो सकती है इसलिए सावधान .................ध्यान दीजिये समय की पाबन्दी को ....
Friday, June 13, 2008
नई सोच की पत्रकारिता ........
समाज बदला विचारधारा बदली पहनावा बदला तो क्यो पत्रकारिता न बदले ?????
पहले पत्रकारिता समाज का आइना होती थी , आज भी है लेकिन नजरिया बदला है आयाम बदले है क्यो ? इसका कारण है टी आर पी को बढाकर पैसा बनाना । नई पीढ़ी के पत्रकार आज दबाव मे है वो ख़बर के बजाय कुत्ते - बिल्ली भूतप्रेत की खबरों को ज्यादा तवज्जो देने लगे है । असली ख़बर देने वाले खबरची नौकरी बचने की जुगत मे है शायद लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ लाचार हो गया है । लोग यही सब देख रहे है तो टीवी वाले ये सब दिखा रहे है क्यो न दिखाए टी आर पी का जो मामला है , ताजा उदाहरण है आरुशी का मामला जिसको जो मन मे आ रहा है वो दिखा रहा है तह तक जाने की कोशिश कोई नही कर रहा है आखिर पुलिस नाकाम हो गई है तो ये क्यो काम करे ।
पहले पत्रकारिता समाज का आइना होती थी , आज भी है लेकिन नजरिया बदला है आयाम बदले है क्यो ? इसका कारण है टी आर पी को बढाकर पैसा बनाना । नई पीढ़ी के पत्रकार आज दबाव मे है वो ख़बर के बजाय कुत्ते - बिल्ली भूतप्रेत की खबरों को ज्यादा तवज्जो देने लगे है । असली ख़बर देने वाले खबरची नौकरी बचने की जुगत मे है शायद लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ लाचार हो गया है । लोग यही सब देख रहे है तो टीवी वाले ये सब दिखा रहे है क्यो न दिखाए टी आर पी का जो मामला है , ताजा उदाहरण है आरुशी का मामला जिसको जो मन मे आ रहा है वो दिखा रहा है तह तक जाने की कोशिश कोई नही कर रहा है आखिर पुलिस नाकाम हो गई है तो ये क्यो काम करे ।
Wednesday, June 11, 2008
तेल पर सरकार की राजनीती ........
पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में इजाफा करके केंद्र की मौजूदा संप्रग सरकार ने अपने ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी है। यह सरकार की अकर्मण्यता का घोतक है और इसके जरिए पहले ही महंगाई से त्रस्त देश की जनता को आर्थिक आतंक में झोंकने का काम किया गया है। देश की जनता को राहत देने में यूपीए सरकार सभी मोर्चे पर विफल रही है। प्रधानमंत्री द्वारा अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की बढ़ती कीमतों का हवाला देकर पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य में वृद्धि को मजबूरी बताना यह साबित करता है कि सरकार का देश की आर्थिक प्रगति का दावा कितना खोखला है। यह निर्णय महंगाई से कराह रहे आम आदमी पर और बोझ लादने जैसा है। मेरे हिसाब से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें कितनी ही बढ़ गई हों लेकिन हालात इतने खराब अभी भी नहीं हुए हैं कि उन्हें ‘बेकाबू’ कहा जा सके। तेल की कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए सरकार स्वयं अपना मुनाफा कम करके जनता को राहत दे सकती है।सरकार पेट्रोल व डीजल पर लगी ड्यूटियों व करों को घटाकर जनता को राहत देने का कार्य करे। सरकार कस्टम ड्यूटी, एक्साइज ड्यूटी तथा राज्य करों को कम करके अपना मुनाफा कम करे और आम जनता को राहत दे। मसलन अगर पेट्रोल 50 रूपये प्रति लीटर बिकता है तो इसका 25 रूपये सार्वजनिक वितरण वाली कंपनियों के और 25 रूपये सरकार के खाते में जाता है। सरकार को अपने इसी मुनाफे को कम करना होगा जिससे इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड तथा भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड जैसी भारत की सार्वजनिक तेल कंपनियों का घाटा भी कम होगा। बड़ी अजीब बात है कि स्वयं केंद्र सरकार एकदम से रसोई गैस पर 50 रूपये, पेट्रोल पर 5 रूपये तथा डीजल पर 3 रूपये की वृद्धि कर देती है और राज्य सरकारों से करों को कम कर इसका भार वहन करने की बात कहती है। वह स्वयं इसके लिए कोशिश क्यों नहीं करती है? वहीं दूसरी आ॓र बार–बार तेल कंपनियों के घाटे की बात कहना किसी भी रूप में तर्कसंगत नहीं है क्योंकि ये सार्वजनिक तेल वितरण कंपनियां जिस कदर घाटा दिखा रही हैं, हकीकत में उतना घाटा उनको नहीं हो रहा है। फिलहाल इनको 1 लाख करोड़ रूपये का घाटा होने की बात कही जा रही है लेकिन सच्चाई का पता इनकी बैलेंसशीट देखकर ही लगाया जा सकता है। पेट्रोल, डीजल, केरोसीन तथा एलपीजी जैसे इनके ऐसे उत्पाद हैं जिनमें इनको घाटा सहना पड़ता है मगर इनके पास आय के अन्य स्रोत भी हैं। उड्डयन में इस्तेमाल होने वाला ईंधन (एविएशन फ्यूल), लुब्रिकैंट्स, तथा पेट्रोलियम वेस्ट जैसे इनके दसों बाई–प्रोडक्ट्स हैं जिनसे इन कंपनियों को भारी मुनाफा होता है। इनसे होने वाले मुनाफे का जिक्र तो इतने जोर-शोर से नहीं किया जाता है।प्रधानमंत्री द्वारा ‘कुछ नहीं हो सकता’ की बात कहकर हाथ खड़े कर देना, यह दर्शाता है कि संप्रग सरकार ने गत चार वर्षों से विकास दर में वृद्धि की आ॓ट लेकर जो प्रचार किया, उसने दरअसल देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करके रख दिया है। तेल मूल्य दाम में बढ़ोतरी का असर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं पर पड़ता है। ऐसे में इस बात का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है कि सरकार का चंद दिनों में महंगाई पर काबू पा लेने का दावा कितना सच्चा है?
Friday, June 6, 2008
पानी के संकट से जूझता झांसी का रानीपुर .....

वैसे तो बुंदेलखंड का इलाका पानी के संकट से और सरकार की उपेक्षा से लगातार जूझ रहा है । लेकिन इस इलाके मे झाँसी जिले के रानीपुर कस्बे मे तो स्थिति कुछ ज्यादा ही बदतर है , झांसी जिले में 30,000 की आबादी के छोटे शहर रानीपुर की जिंदगी पानी के इंतजार पर टिकी हुई है। यहाँ जब सरकारी टैंकर आता है तो पानी लेने के आपाधापी मे सिर फुटव्वल की नौबत आ ही जाती है और ये रोज की घटना बच्चे तो रोज ही चोटिल हो जाते है । यहाँ तो शौचालय घर में होने पर भी पानी के अभाव में अधिकांश परिवार उनका उपयोग नहीं कर पाते हैं और दूर खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। 9 से 15 साल के छात्र जिनके पढ़ने लिखने की उम्र है वो पानी के लिए साइकल पर चार से छह बर्तन लादकर डेढ़-दो किलोमीटर दूर से पानी लाते हैं। केन्द्र सरकार की सर्व शिक्षा अभियान योजना इन बच्चो के लिए उतना मायने नही रखती जितना की घर मे पानी ले आना । यहाँ पर 91 लाख रुपये की एक योजना बनाई गई थी पर भ्रष्टाचार के कारण वह सफल नहीं हुई। आज भी उचित प्रयास हो तो इसे सुधारा जा सकता है। जल वितरण की व्यवस्था को भी सुधारना जरूरी है। आज की व्यवस्था विषमतापूर्ण है जिसमें कुछ असरदार लोग अधिक पानी अवैध ढंग से ले जाते हैं। दूसरी ओर अनेक परिवार इससे पूरी तरह वंचित हैं। खास कर बुंदेलखंड का इलाका जहाँ योजनाओं को तो कागजो मे लागू किया गया है आख़िर कब इनको कार्य रूप मे परिणित किया जाएगा ? जब और स्थिति और विकत हो जायेगी ।
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