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Monday, December 5, 2011

अभी न जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं.......


रविवार की सुबह देर से सो कर हमेशा उठने की आदत रही है..वैसा ही इस रविवार को भी हुआ.. लेकिन बिस्तर पर दूसरे कमरे से आ रही टेलीविजन की आवाज़ और देव साहब के द्वारा फिल्माए गए गीतों की लगातार आ रही धुन बहुत अच्छी लग रही थी लेकिन कुछ अनहोनी होने का अंदेशा भी मन में उठ रहा था.....कि आज ऐसा क्या हुआ की इतने अच्छे गानों से सुबह हो रही है.. आनन- फानन में उठा और जिस बात का डर था वही हुआ... 1०० से अधिक फिल्मों में अपने अभिनय से मंत्रमुग्ध कर देने वाले पद्मा भूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कारों से सम्मानित धर्मदेव आनंद, जो कि देव आनंद के नाम से प्रसिद्ध हैं, उनका निधन हो गया ...देव साहब के निधन से लगता है की जिन्दा-दिली ने जिंदगी को अलविदा कह दिया...देव साहब ने जिंदगी के फलसफे को परदे पर और वास्तविक जीवन में भी जिया है... उनके जाने से लगता है कि हमने अपने जीवन से अपने गाइड खो दिया और जिंदगी का साथ निभाने वाला आज जिंदगी छोड़ कर चला गया.... आपके जाने से अब यह गाना बेमानी लगने लगा है...देव साहब ने हिन्दुस्तानी मर्दों को ख़ूबसूरती का सलीका सिखाया... वो ऐसे सख्शियत रहे हैं जिनकी ख़ूबसूरती की चर्चा नर्गिस और मधुबाला से ज्यादा हुई है ... इस हर दिल अज़ीज़ कलाकार को फिल्म इंडस्ट्री में चाकलेट हीरो के रूप में मान्यता मिली और उन दिनों में मशहूर हुए तीन सुपरस्टार त्रिमूर्ति के त्रिकोण, दिलीप कुमार और राज कपूर ,का तीसरा कोण थे. तीनों नें अपने-अपने अलग मकाम बनाये, और पहचान स्थापित की...देव साहब ने अपने अभिनय के द्वारा हमें उस नायक से मिलवाया जो रोमान्स और प्रेम की मन मोहनी दुनिया में हमें ले जाता है, और भावना के नाजुक मोरपंखी स्पर्श से हमारे वजूद में रोमांस को चस्पा करता है.... यह वह सपनों का राजकुमार था जिसका जन्म ही प्यार करने को हुआ था. एक ऐसा व्यक्तित्व जो मन को गुदगुदानेवाला, आल्हादित करने वाला था जिसे सदा ही जवां मोहब्बत का वरदान मिला हुआ है. युवतियों के दिलों का ताज और युवकों के रोल मॉडल के रूप में देव बखूबी सराहे गए.... अपने समकालीन नायकों दिलीप कुमार और राज कपूर से अभिनय क्षमता में देव साहब उन्नीस ज़रूर थे, मगर लोकप्रियता (विशेषकर महिलाओं में)और करिश्माई व्यक्तित्व के मामले में इक्कीस थे.... देवसाहब की डायलॉग डिलीवरी का भी अलग ही अंदाज़ रहा है, और उनका यही अंदाज उन्हें दूसरे नायको से अलग लाकर खड़ा कर देता है..... जिंदगी का साथ उन्होंने बड़ी ही जिन्दादिली से दिया है और देवानंद जी ने फिल्म इंडस्ट्री में तीन पीढ़ियों के साथ काम करके अपने अभिनय और निर्देशन का लोहा मनवाया है उन्होंने हमेशा सामाजिक विषयों पर फ़िल्में बनाने में यकीन किया... उदाहरण के लिए प्रेम पुजारी और हरे राम हरे कृष्णा जैसी फ़िल्में थी जो लीक से हट कर थी...कुछ वर्ष पहले उन्होंने 'रोमांसिंग विद लाइफ' नाम से अपनी जीवनी बाजार में उतारी थी। आमतौर पर मशहूर हस्तियों की जीवनियों के प्रसंग विवादों का विषय बनते हैं लेकिन उनकी जीवनी हर अर्थ में बेदाग रही बिल्कुल उनके जीवन की तरह। देव साहब भारतीय सिनेमा में हमेशा से शहरी आधुनिक युवा के प्रतिनिधि रहे हैं और आज भी उनके व्यक्तित्व में युवा ऊर्जा और चपलता मौजूद थी। उम्र के इस मोड़ पर भी उनकी सक्रियता देखने को मिलती थी... 88 वर्षीय देव साहब खुद ही कहा करते थे की कि दिल जवां हो तो उम्र कभी आड़े नहीं आती......लेकिन खबरें कह रहीं हैं देव साहब अब आप इस दुनिया में नहीं रहे. लेकिन जो देवानंद नहीं रहे, वो तो मेरे लिए थे भी कभी नहीं... क्योंकि मैंने उन्हें कभी बाबदन देखा ही नहीं. जो देवानंद मेरे लिए थे वो हैं और इंशाल्लाह रहती दुनिया तक रहेंगे. वो एक अंदाज़ एक आवाज़ थे जो रूह की भाषा में गुफ़्तगू करते थे….. देव जी आप चोला बदल सकते हैं. लेकिन चाहने वालों के दिल से निकलना आपके भी हाथ में नहीं है. आप भागने की नाहक कोशिश कर रहे हैं. आपके वजूद का एक हिस्सा हमारे दिल की कफ़स में हैं. हम आपतक महदूद हैं और आप हम तक ।

अतुल कुमार मिश्र
रिसर्च मैनेजर
इंडिया न्यूज़

(नोट - लेखक से आप इंडिया न्यूज में संपर्क कर सकते हैं । )

Sunday, November 20, 2011

विभाजन का खेल- कौन पास कौन फेल ?......



उत्तर प्रदेश की मुखिया बहन मायावती, जो लगातार अपने मंत्रियो के भ्रष्टाचार के आरोपों और विपक्ष के लगातार दबाव से घिरी दिख रही थी, आखिर अपना नया राजनीतिक दांव खेल दिया... जिससे देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश चार भागों (अवध प्रदेश, पूर्वांचल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड) में विभाजित करने की बात कही है... बहन जी ऐसी पहली मुख्यमंत्री होंगी जो सत्ता में रहते हुए भी प्रदेश बटवारे की मांग उठाई हैं... बहन जी का यह दांव जिसके लिए न कभी प्रदेश में कोई राजनीतिक आन्दोलन हुआ और न ही कभी प्रदेश के रहने वालों ने इसके लिए आवाज़ बुलंद की जिस प्रकार पृथक तेलंगाना के लिये किया गया है... हाँ यदा कदा अमर सिंह जैसे नेताओं ने राजनैतिक रोटियाँ सेकने के उद्देश्य से अलग पूर्वांचल की और बुंदेलखंड के कुछ स्थानीय गुटों ने अलग बुंदेलखंड की आवाज़ जरूर उठाई थी... सन 1947 में अस्तित्व में आए उत्तर प्रदेश को जो पहले यूनाइटेड स्टेट ऑफ़ प्रोविंस एंड अवध था, विकेंद्रीकरण के इस खेल बाद निश्चित रूप से बहन जी के लिए राजनितिक दृष्टिकोण से बहुत ही लाभदायक सिद्ध होगा... जाहिर है बहन जी कोई नौसिखिया राजनीतिज्ञ नहीं है और प्रदेश विभाजन से सबसे ज्यादा फायदा मिलने की बात हो तो बहन जी की बहुजन समाज पार्टी सबसे पहले पायदान पर दिखेंगी और यह निश्चित रूप से विभाजन का यह खेल राजनैतिक फायदे के लिए किया गया है... वहीं अगर विपक्षी दलों की बात करें तो प्रदेश विभाजन के इस खेल को सियासी दांव बता रहे है , वहीं राजनीतिक आंकड़ो के लिहाज़ से अगर बात की जाय तब भी प्रदेश विभाजन के पश्चात बहन जी को राजनीतिक लाभ मिलता दिखाई पड़ रहा है... क्योंकि वर्तमान समय में अगर विधानसभावार प्रदेश में सीटों का बटवारा देखा जाय तो चारो प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार ही बनती दिखाई पड़ रही है... वहीं प्रदेश की राजनीतिमें कद्दावर माने जाने वाले विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और अजित सिंह की राष्ट्रीय लोक दल को अच्छा खासा झटका लग सकता है...


UP: STATE DIVISON



REGION

BSP

SP

BJP

INC

RLD

OTHERS

TOTAL

BSP(-)

PURVANCHAL

83

43

18

9

0

5

158

75

AVADH

46

40

14

6

0

7

113

67

BUNDELKHAND

29

7

5

5

0

0

46

17

WESTERN UP

48

7

14

2

10

5

86

38

TOTAL

403









वर्त्तमान सीटो के आधार पर दल गत स्थिति


वैसे प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले राज्य विभाजन की बात करना बेमानी ही है क्योंकि संसद का शीतकालीन सत्र और उत्तर प्रदेश का शीत कालीन सत्र लगभग साथ- साथ शुरू होता और विभाजन का यह प्रस्ताव संभवतः संसद के बज़ट सत्र में आएगा तो विधानसभा चुनाव के पहले विभाजन केवल एक परिकल्पना ही लगती है... लेकिन विभाजन के इस नए खेल के साथ मायावती ने उत्तर प्रदेश के बाहर भी राजनीतिक पारी खेलने का मन बना लिया है और और अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को बढ़ाने की इक्षा जाहिर की है और वहीं एक दिलचस्प बात यह देखने को मिलेगी कि वह पार्टी में अन्य लोगों के साथ राजनीतिक सत्ता की लूट साझा करने के लिए तैयार हैं... बहन जी के इस फैसले से पता चलता है कि मायावती ने उत्तर प्रदेश के बाहर अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू कर दिया है, लेकिन केंद्र की राजनीति में पकड़ बनाने में अभी बहुत लम्बा सफ़र तय करना बाकी है क्योकि पुरानी कहावत यह चरितार्थ करती है की "दिल्ली अभी दूर है"... लेकिन निश्चित रूप से देखा जाय तो बहन जी का यह कदम जो की चुनावी लाभ लेने की नीयत से किया गया फैसला है विकास के नजर से इसका स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि साम्प्रदायिकता और जातिवाद से पीड़ित प्रदेश में विकास की राजनीती की शुरुवात है...


अतुल कुमार मिश्र
रिसर्च मैनेजर
इंडिया न्यूज़

नोट - आप लेखक से इंडिया न्यूज चैनल में संपर्क कर सकते हैं.....

Wednesday, September 21, 2011

रफ्तार का रोमांच-इंडियन ग्रांप्री


महज 36 दिनों के बाद हर भारतीय रेसर का सपना पूरा होने जा रहा है। ग्रेटर नोएडा के ग्रेटर नोएडा के बुद्धा इंटरनैशनल सर्किट में रफ्तार के रोमांच का मजा बड़े आराम से कई एक धनाड्य हिंदुस्तानी उठाते नजर आएंगे। करोड़ों - अरबों के वारे न्यारे हो रहे है, इंडियन ग्रांप्री के ट्रैक बनने में करीब 40 करोड़ डॉलर खर्च हुए है। शायद इतने पैसों से भारत के कुछ एक राज्यों के खाने-पीने की समस्या हल हो जाती। लेकिन इस खर्च के बाद जो निकल के आएगा वो वाकई में रोमांच से लबरेज होगा। भारत की तरफ से भाग लेने वाले नारायण कार्तिकेयन और करुण चंडोक से खासी उम्मीदें हैं, ये खिलाड़ी अब तक विदेशों में जाकर इस तरह के आयोजन में भाग लेते थे, पर अब इन्हे अपने घरेलू दर्शकों के बीच जोरआजमाईस करने का मौका मिलेगा। कार्तिकेयन और चंडोक के लिए अपने देश में रेसिंग करना एक सपने को हकीकत में बदलने जैसा है।
इंडियन ग्रांप्री में रफ्तार का आलम ये होगा कि इंडियन ग्रांप्री के ट्रैक पर रेसिंग कारे 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ेंगी। मुकाबला 28 से 30 अक्तूबर के बीच होना है, जिसमें 28 अक्तूबर को प्रैक्टिस मैच, 29 अक्तूबर को क्वालीफाईंग मैच उसके बाद 30 अक्तूबर को होगा फाइनल का संग्राम । टिकट की कीमतें भी खास रखी गई हैं जिसमें 2500 रुपए से लेकर 35 हजार तक है इसके साथ ही यहां पर बॉक्स की भी व्यवस्था की गई है जिसकी कीमत करीब 35 लाख से लेकर 1 करोड़ तक रखी गई है।
ग्रेटर नोएडा के बुद्धा इंटरनैशनल सर्किट अपने आप में खास रेसिंग ट्रैक है। दुनिया का सबसे शानदार रेसिंग ट्रैक बनाया गया है जिसमें दो स्पेशल कार्नर है । भारत के पहले इंटरनैशनल रेसिंग ट्रैक के डिजाइन की एक और जबर्दस्त खासियत है, इस ट्रैक पर ड्राइवर को सामने के टर्न के अलावा आने वाला अगला टर्न भी दिखाई देगा जिससे ड्राइवर को अपनी स्पीड बढ़ाने में मदद मिलेगी।
फार्मूला वन रेस के दौरान एक चीज और खास होने वाली है वो ये है कि इसमें शिरकत करने वाले हर व्यक्ति का चाहे वो ड्राइवर हो या फिर रेस में सहयोग करने वाले स्टाफ हो या फिर देखने वाले दर्शक, सभी का बीमा होगा।
खैर इंडियन ग्रांप्री से जो कुछ निकल के आएगा उससे तो किसी गरीब का भला तो होने से रहा, पर देश के नाम एशियाड,कॉमनवेल्थ के बाद एक और आयोजन कराने का तमगा जुड़ जाएगा। वैसे कॉमनवेल्थ की पोल-खोल से आप पूरी तरह से वाकिफ होंगे लेकिन रफ्तार के इस रोमांच को बनने में ऐसा कुछ नहीं देखने को नहीं मिलेगा क्योंकि यहां पर नौकरशाही और और राजनीति जैसे काले चेहरे नहीं है, कलमाड़ी और भ्रष्ट अफसर नहीं है लिहाजा जहां जितने पैसे लगने हैं उतने ही लगेंगे। इंडियन ग्रांप्री का सारा मैनेजमेंट प्राइवेट कंपनियों के हाथो में है।

आपका
विवेक मिश्रा

Friday, February 18, 2011

रिक्शे की सवारी, बाजारवाद या फिर कुछ और...



विश्व कप के महासंग्राम में करोड़ो अरबों रुपया पानी की तरह बह रहा है, कहीं पर मैदान के बाहर जमकर पैसा खर्च हो रहा है तो कहीं मैदान के बाहर । क्रिकेट के चाहने वाले तो अपनी नजरे टीवी पर गड़ाए बैठे है तो कुछ स्टेडियम में मैच का नजारा लेने के लिए टिकट कटवा रहे हैं, इन प्रशंसको पर विज्ञापनकर्ताओं की नजर लगी हुई है लिहाजा कोई चूक ना हो इसलिए हर जगह विज्ञापन देखने को मिल रहे है।

गेंद और बल्ले की इस महाजंग में दौलत शोहरत और मेहनत तीनों अपने शबाब पर है, लेकिन इस बीच में बंगबंधु स्टेडियम में वर्ल्ड कप के उद्घाटन समारोह में सभी 14 देशों के कप्तान रिक्शे पर नजर आए ये महज इत्तफाक हो सकता है, लेकिन हमारी नजर में ये इत्तफाक ही नही बल्कि कुछ और है। क्रिकेट के ये नामचीन चेहरे जिनके एक कंधे पर टीम का भार है तो दूसरे कंधे पर करोड़ो रुपए के विज्ञापन का बोझ वो रिक्शे पर बैठकर उद्घाटन समारोह में शिरकत करने आए इसके पीछे मामला कुछ औऱ ही है।

भारतीय उपमहाद्वीप में रिक्शे की सवारी कोई नई बात नहीं है, लेकिन बंगबंधु स्टेडियम में इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों के कप्तानों का हाल देखने लायक था। ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पॉन्टिंग असहज महसूस कर रहे थे तो दक्षिण अफ्रीकी कप्तान ग्रेम स्मिथ हैरान थे, इस बीच भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी और बांग्लादेशी कप्तान साकिब अल हसन मंद-मंद मुस्करा रहे थे। खैर इन बातों को छोड़िए मुद्दे की बात ये है कि कप्तान धोनी कितने दिनों बाद रिक्शे पर नजर आए हैं खुद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को भी नहीं पता। मंहगी गाड़ियों से चलने वाले ये कप्तान रिक्शे पर बैठकर स्टेड़ियम में पहुंचे इसके पीछे उन चेहरों का हाथ है जो गांवो शहर की गलियों में झुंडों में बैठकर वर्ल्ड कप का नजारा लेंगे, क्योंकि ये वही दर्शक है जो वर्ल्ड कप को चाव से देखते हैं, इसकी लोकप्रियता को बढ़ाते हैं और रिक्शे पर चलते भी हैं।

विश्व कप में करोड़ो अरबों के वारे न्यारे हो रहे हैं, 43 दिन के इस आयोजन में 3,915 करोड़ रुपये का कारोबार होने का मोटा अनुमान है। 1992 वर्ल्ड कप से ही किक्रेट में बिजनेस की भूमिका अहम हो गई है। वर्ष 2011 किक्रेट से होने वाली कमाई के लिहाज से हाल में सबसे अहम साल है। मनोरंजन इंडस्ट्री के आंकड़ों पर नजर डालें तो किक्रेट वर्ल्ड कप के दौरान कुल 3915 करोड़ रुपए का कारोबार होने की उम्मीद है जो अब तक आयोजित किसी भी आईसीसी टूर्नामेंट के लिए सबसे ज्यादा है। इस टूर्नामेंट में टीवी राइट्स और स्पॉन्सरशिप के जरिए आईसीसी 1500 करोड़ रुपए की कमाई करने वाली है। टिकट ब्रिकी के जरिए 100 करोड़ रुपए तो ट्रेवल एंड हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री 500 करोड़ रुपए का कारोबार करेगी। वहीं टीवी विज्ञापनों पर कुल 600 करोड़ रुपए खर्चे जाने की उम्मीद है। स्टेडियमों के नवीनीकरण पर कुल 1000 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं जबकि खिलाड़ियों के पुरस्कार और मैच फीस के लिए कुल 45 करोड़ रुपए खर्चे जाएंगे। ग्रांउड मार्केटिंग में 120 करोड़ रुपए का कारोबार होना है और किकेट मर्केंडाइज कुल 50 करोड़ की कमाई की उम्मीद है। दुनिया भर में किक्रेट पर निगरानी रखने वाली सर्वोच्च इकाई आईसीसी की कमाई का मुख्य जरिया प्रसारण अधिकार और स्पॉन्सरशिप है। 10 सेकेंड के विज्ञापन के लिए 3.5 लाख रुपये: वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट का फायदा उठाने का मौका कोई भी कंपनी चूकना नहीं चाहती। इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि जहां 2010 में कंपनियों ने अपने मार्केटिंग बजट का 6-8 फीसदी हिस्सा किेट पर खर्च किया था। वहीं 2011 में यह आंकड़ा बढ़कर 10-12 फीसदी होने की उम्मीद है।

चलिए ये तो हो गई खर्चे की बात, जेंटलमैन के इस गेम में अब कुछ भी जेन्टल नहीं रह गया है। सब कुछ बाजारवाद पर निर्भर हो गया है। भारत की भोली-भाली जनता को बरगलाना कोई इन क्रिकेट के सितारों से सीखे, कप्तान धोनी जो कोल्ड ड्रिंक पीते हैं वो जनता पीने के लिए बेकरार रहती है, आम जनता के पसंदीदा खिलाड़ी जो ब्रांड पहनते है उसे जनता पहनना पसंद करती है और क्रिकेट स्टार जो मोबाईल फोन प्रयोग में लाते हैं उसे उसके फैन्स जरुर खरीदते है, तो ऐसे में क्या रिक्शे से बंगु-बंगु स्टेडियम में पहुंचना आम जनता को लुभाना है या फिर वाकई में ये कप्तान अपनी संस्कृति को प्रदर्शित करना चाह रहे है। वैसे भी कप्तान धोनी की कमाई सालाना 50 करोड़ रुपए है जो किसी भी क्रिकेट स्टार की कमाई से ज्यादा है।


विवेक मिश्रा
खेल पत्रकार, इंडिया न्यूज

Saturday, February 5, 2011

वर्ल्ड कप के बदलते रंग....



बड़े कॉलर वाली शर्ट .. बेलबॉटम पैंट .. बड़े बाल और बड़ी मूछें ... और आने वाले बदलाव की सोच लिए इस फटाफट क्रिकेट के महाकुभ को शुरु हुए 36 साल हो चुके है .... इन 36 सालों में ना तो गेंदबाजो और बल्लेबाजो के बीच में छत्तीस का आकड़ा बदला ... ना ही चौको छ्क्को की बारिश बंद हुई .. ना ही क्रिकेट का रोमांच कम हुआ ...और ना ही विरोधी को ध्वस्त करने की कोशिश कम हुई ... बस बदला तो इस खेल को खेलने वाले खिलाड़ियो का स्वरूप ....

1975 में जब पहली बार क्रिकेट का वर्ल्ड कप शरु हुआ तो हम हर टीम के खिलाड़ी को बटन वाली शर्ट जिसकी उपर की चार बटन खुली .. और 22 इंच की मोहरी वाली पैंट आज भी लोगो के जेहन में ताजा है शर्ट पर भले ही एक भी स्पांसर का लोगो ना हो पर ... खिलाड़ियो का अंदाज कम निराला नहीं था ....तब ज्यादातर खिलाड़ी रौबदार मूछों के साथ मैदान पर नज़र आए .. और ये सत्तर के दशक के फैशन का दौर था तब .. और ये फैशन 4 साल बाद भी कायम रहा .. जब 1979 में लगातार इसी तरह के गेटअप और सेटअप के साथ कैरेबियन टीम ने लगातार वर्ल्ड कप पर कब्जा किया ..बस फर्क इतना था कि तब के क्रिकेटर मूछ के बिना अपनी सूझ के जरिए पहचान बनाने की कला समझ चुके थे ...

1983 वर्लड कप में बहुत कुछ बदला ... शर्ट की जगह टीशर्ट ने ले ली थी ..... बैट पर लोगो दिखने लगा था ....और मूछों का चलन फिर लौट आया था .... इन्ही मूछों की करामात ने टीम इंडिया को वर्ल्ड चैंपियन बना दिया था ... कप्तान कपिल समेत ... टीम में सबकी मूछें थी और फिर क्या था कप पर टीम इंडिया का कब्जा ... मूछों का ये प्रचलन .. 1987 में भी रहा .. और फाइनल में दो मूछों वालो कप्तान की भिड़ंत में एलन बार्डर ने कप पर कब्जा किया .. ये वो दौर था जब टीशर्ट पर लोगो और क्रिकेट के मैदान पर पैसे बरसने का दौर शुरु हुआ .....

1992 ..... नब्बे के दशक में क्रिकेट के मैदान पर सबकुछ बदलता नज़र आया ॥ पहली बार वर्ल्ड कप रंगीन कपड़ो में रोशनी के बीच खेला गया ..मूछें गायब हो चुकी थी ... चुस्त टीशर्ट ... बड़े बाल ... बेहतरीन सुविधाए और .. शानदार लुक्स के बीच में पाकिस्तान ने वर्ल्ड कप पर कब्जा किया ... ये वो दौर था जब क्रिकेट खेल एक बड़े बदलाव की तरफ आगे बढ़ रहा था ....कुछ इसी तरह के बदलाव के बीच 1996 में श्रीलंका ने वर्ल्ड कप पर कब्दजा किया ... टीशर्ट पर लोगों .. खेलने की शैली में बदलाव और ढेरो स्पेंसर के बीच बदलने लगा खिलाड़ियों का लुक .... 1999 ... वरर्ल्ड कप में ..में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला .. टीशर्ट पर कुछ लिखने की जगदह नहीं थी .. खिलाड़ी नाम नहीं नंबर से पहचाने जाने लगे .... और बॉल बड़े के बजाए छोटे होने लगे ... ये वो दौर था जब क्रिकेटर्स के बीच में क्रूज कट बहुत लोकप्रिय हुआ ...... ये वो दौर था जब आस्ट्रेलियाई टीम ने वर्ल्ड क्रिकेट पर अपना साम्राज्य स्थापित करना शुरु किया था ... 1999 से 2007 तक यानि 8 साल आस्ट्रेलियाई टीम ने वर्ल्ड क्रिकेट पर राज्यय किया .... इस दौरान .. कभी मूछे आई तो कभी गई ... खिलाड़ी आए भी गए भी ... बस नहीं गया तो फैशन और खिलाड़ियो के बदलते लुक का जमाना ...... अब बात 2011 वर्ल्ड कप की है ... और सबको इंतजार इस वर्ल्ड कप में आने वाले फैशन का है ..... तो तैयार हो जाइए आप भी इस बदलाव का मज़ा उठाने के लिए ...



आपका

विवेक मिश्रा

Friday, January 14, 2011

गणतंत्र के 61 साल...



26 जनवरी 2011 को हम अपना 61 वां गणतंत्र मना रहे है । 26 जनवरी 1950को हमारे देश का संविधान को महान देशभक्तों ने मिलकर बनाया और इसी दिन देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र पसाद ने भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक जन्‍म की घो‍षणा की । 26 जनवरी 1950 को भारत एक पूर्ण गणतंत्र राष्ट्र के रुप में विकसित हुआ । भारत 15 अगस्‍त 1947 को एक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र बना, इसने स्‍वतंत्रता की सच्‍ची भावना का आनन्‍द 26 जनवरी 1950 को उठाया जब भारतीय संविधान प्रभावी हुआ। इस दौरान देश ने बहुत तरक्की की, औद्योगिक क्रांति से लेकर टेक्नोलॉजी में क्रांति बहुत कुछ । देश की तरक्की से आज हम अपने आप को संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल देशों की कतार में खड़े है । अमेरिका, चीन, रुस, जापान जैसी महाशक्तियां भारत को अपने साथ लेकर चल रही है । लेकिन इन सब के पीछे हम उन महान सपूतों, देशभक्तों को कैसे भूल सकते है जिनकी बदौलत हम आज आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे है । सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, लाला लाजपत राय जैसे महान क्रांतिकारियों के बलिदान से हमे आजादी मिली ।
देश को आजादी दिलाने में सरदार भगत सिंह का अहम योगदान है । भगत सिंह में जो देश प्रेम का जज्बा था वो बहुत कम देखने को मिलता है । भगत सिंह जलियाबाग हत्य़ा कांड से प्रेरित होकर क्रांतिकारी बने । महज 24 साल की अवस्था में भगत सिंह हसंते - हसंते फांसी के फंदे को चूम लिए । 23 मार्च 1931 भगत सिंह की शहादत का दिन कोई कैसे भूल सकता है । भगत सिंह ने राजगुरू के साथ मिलकर 17 दिसंबर 1926 लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जेपी सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में भगत सिंह का साथ महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने दिया था । क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने नई दिल्ली की सेंट्रल एसेंबली के सभागार में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिए बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी। भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद गांधी जी ने भगत सिंह को बचाने के लिए पुरजोर कोशिश भी की थी । लेकिन भारत मां के सपूत भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने फांसी के फंदे को चूमना बेहतर समझा । आज भगत सिंह नहीं है लेकिन वो हर भारतीय के जेहन में अभी भी जिंदा है क्योंकि आज हम भारतीय भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों की वजह से आजाद हैं ।
सरदार भगत सिंह के सबसे महत्वपूर्ण साथी चंद्रशेखर आजाद थे । 23 जुलाई 1906 को जन्मे चंद्रशेखर आजाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अत्यंत सम्मानित और लोकप्रिय क्रांतिकारी स्वातंत्रता सेनानी थे । असहयोग आंदोलन समाप्‍त होने के बाद चन्द्रशेखर आजाद की विचारधारा बदली और वो आजादी की जंग में कूद गए । स्वतंत्रता संग्राम में कूदने के बाद आजाद ने काकोरी कांड और सांडर्स हत्या जैसे महान कारनामों को अंजाम दिया । 1919 में जलियावाला बाग हत्याकांड ने चंद्रशेखर को काफी विचलित किया था । 27 फरवीर 1931 को भारतीय क्रांतिकारी इतिहास का प्रलयकांरी दिन था पण्डित चन्द्रशेखर आजाद अल्फ्रेड पार्क में सुखदेव,सुरेन्द्र नाथ पांडे एवं श्री यशपाल के साथ चर्चा में व्यस्त थे। तभी किसी मुखविर की सूचना पर पुलिस ने उन्हें घेर लिया। और वो अंग्रेजों के हाथो लड़ते-लड़ते आखिरी गोली अपने आपको मार कर शहीद हो गए ।
सन् 1928 पंजाब केसरी के नाम से मशहूर लाला लाजपत राय की शहादत के लिए याद किया जाता है । देश के नाम अपने आप को समर्पित करने वाले क्रांतिकारियों में लाला लाजपत राय का भी अहम योगदान रहा है । लाला लाजपत राय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के अगुवा थे । लाला लाजपत राय ने पंजाब नैशनल बैंक और लक्ष्मी बीमा कम्पनी की भी स्थापना की। बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ मिलकर लाला लाजपत राय ने सबसे पहले पूर्ण स्वराज की मांग उठाई, इन तीनों की तिकड़ी को लाल,पाल,बाल के नाम से जाना जाता था । सन् 1928 में महान क्रांतिकारी लाला लाजपत राय ने साइमन कमीशन के विरुद्ध विरोध - प्रदर्शन करते हुए सांडर्स के हाथो लाठी चार्च में घायल होकर शरीर त्यागा।
देश को आजादी दिलाने में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कोई कैसे भूल सकता है । तुम मुझे खुन दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा और जय हिंद का नारा देने वाले महान क्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस तो देश के बाहर अपनी एक सेना तैयार कर ली थी । द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजो से लड़ने के लिए सुभाष चंद्र बोस ने जापान में आजाद हिंद फौज का गठन किया था । जिसका मुख्य मकसद अंग्रेजी साम्राज्य को नेस्तेनाबूत करना था । भेष बदलकर अंग्रेजों को चकमा देना सुभाष चंद्र बोस की आदत थी । नेताजी के देश सेवा का सफर कोलकाता के स्वतंत्रता सेनानी देशबंधु चितरंजन दास की वजह से हुआ, देशबंधु से प्रेरित होकर नेताजी इंग्लैंड से भारत वापस आए । अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाषबाबू को कुल ग्यारह बार कारावास हुआ। सबसे पहले उन्हें 1921 में 6 महिनों का कारावास हुआ। 1938 में कांग्रेस के 41 वें वार्षिक अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस को अध्यक्षता मिली थी । देश के लिए सुभाष चंद्र बोस के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता ।
लौह पुरुष के नाम से विख्यात सरदार बल्लभ भाई पटेल का भी नाम उन स्वतंत्रता सेनानियों की फेहरिस्त में है जो देश के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिए । आजादी से पहले सरदार बल्लभ भाई पटेल की क्रांति ने अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिए थे । स्वतन्त्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला और बडा योगदान खेडा संघर्ष में हुआ। बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिये ही उन्हे पहले बारडोली का सरदार औअर बाद में केवल सरदार कहा जाने लगा। आजादी के बाद पटेल जी ने प्रधानमंत्री पद की दौड से अपने को दूर रखा और इसके लिये नेहरू का समर्थन किया। उन्हे उपप्रधान मंत्री एवं गृह मंत्री का कार्य सौंपा गया।
देश की विडंबना ये है कि हम इन सच्चे देश भक्तों को कभी-कभार ही याद करते हैं । हम ये भूल जाते है कि आज हम इन्ही महान क्रांतिकारियों की बदौलत ही आजाद है । देश के इन सपूतों के योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता ।

आपका
विवेक मिश्रा

Wednesday, May 12, 2010

शतरंज मस्त क्रिकेट पस्त...




दोस्तो नमस्कार.....

दो बातें है एक अच्छी और एक बुरी............पहली ये कि हम एक बार फिर से विश्व चैंपियन हो गये.....जी हां वन मैन ऑर्मी वाले खेल में हम विश्व विजेता बन गये है .....लेकिन वहीं ११ मैन ऑर्मी वाले खेल में हम ढाक के तीन पात हो गये......... जी हां भारतीय शेर कहे जाने वाले धोनी के धुरंधर बड़े ही बुझे मन से स्वदेश वापसी कर लिये है.....ट्वेन्टी - ट्वेन्टी वर्ल्ड कप में टीम इंडिया की शर्मनाक हार हुई है...........लेकिन संतोष देने वाली खबर ये है कि शतरंज में हम अपने शेर के वजह से पूरे विश्व में सिर उंचा किये हुए है.......सोफिया में खत्म हुई विश्व कप में भारतीय जाबांज विश्वनाथन आनंद से बेसलीन तोपालोव को बुल्गारिया के सोफिया में वासेलिन टोपालोव को १२ वीं और अन्तिम बाजी में हरा दिया है.....शतरंज में भारतीय झंडा जहां फहरा रहा है॥वही आईपीएल के वजह से हम साल २००७ के उस याद को फिर से दोहरा नही पाये..... खैर आईपीएल में पार्टी शार्टी का दौर चला लोग मस्ती किये...खुद टीम इंडिया के सेनापति भी मौज मस्ती किये...लेकिन अब वो चेत गये है कि पार्टी खतरनाक है भाई.....




अब हम असली भारतीय शेर यानि विश्वनाथन आनंद की बहादुरी के किस्से बतातें है-------


विश्व चैम्पियनशिप (2000, 2007, 2008 और 2010), विज्क आन जी में कोरस सुपर जीएम टूर्नामेंट (1989, 1998, 2003, 2004, 2006), डार्टमंड (1996, 2000, 2004), कोरसिका मास्टर्स (2000, 2001, 2002, 2003, 2004), मेंज में चेस क्लासिक ( 2000, 2001, 2002, 2003, 2004, 2005, 2006), विश्व कप : 2000, 2002), मलोडी अंबर टूर्नामेंट (1994, 1997, 2003, 2007), रेगियो एमीलिया (1991), लिनारेस (1998, 2007), द क्रेडिट सूइसी मास्टर्स (1997), डोस हेरामनास : (1997)।

Sunday, May 9, 2010

चकल्लस में मीडिया...


नमस्कार दोस्तों-
मीडिया मीडिया और मीडिया..........हर जगह ये लोग पहुंचे रहते है....बिना बताये और बिना बुलाये....अभी हाल ही में शिरडी में एक घटना घटी...या कहे कि घटना घटा दी गयी...रितिका रोशन मीडिया के दुश्मन बन गये थे...हर न्यूज़ चैनल उनको खलनायक के रूप में पेश कर रहा था.....मीडिया के साथ बदसलूकी का पूरा ठीकरा रितिक रोशन पर फोड़ दिया गया.. पूरा माजरा हम आपको बताते है कि क्या हुआ था उस दिन.....फिल्म अभिनेता रितिक रोशन अपने परिवार के साथ शिरडी के सांई बाबा के मंदिर में दर्शन करने गये थे...जो कि वो हमेशा किसी भी फिल्म के रिलीज होने के पहले करते है....ऐसा इस बार भी किये..लेकिन घटना ये घटी कि बिना बुलाये मेंहमान वहां भी पहुंच गये....फिर क्या होना था...वही जो बिना बुलाये मेहमान करते है...धक्का मुक्की का दौर चला...और इल्जाम लगा रितिक रोशन पर...रितिक को कहा गया कि वो फिल्म के पब्लिसिटी के लिये इस तरीके की हरकत कर रहे है..जबकि रितिक ने ट्विटर पर लिखे कि ये उनका निजी दौरा था जिसमें वो मीडिया को मना कर रहे थे लेकिन मीडिया ने नहीं माना और उनका फोटो खीचने लगें...जिसकी वजह से ये सारा मामला हो गया...अब रितिक रोशन को भी समझना चाहिये कि शिरडी के सांई बाबा उनके अकेले तो है नही...मीडिया ने बकायदा मंदिर प्रशासन से अनुमति लेके मंदिर में प्रवेश किया था....खैर ऐसे मौको पर मीडिया ताक में रहती है कि कोई घटना ऐसी हो जाये जिससे उनको मशाला मिल जाये...भाई मीडिया के बारे में जहां तक मै जानता हूं वहां एक बात सामने निकल के आती है..वो बात ये है कि रिपोर्टर जब भी किसी ख़बर के लिये ऑफिस से निकलता है तब उसका मेन मोटो यही होता है कि कोई ब्रेकिंग मिल जाये नहीं तो बना ली जायेगी क्योंकि बॉस की तारीफ जो बटोरनी है...इन रिपोर्टर लोगो को ये पता होना चाहिये कि वो इन सस्ती टीआरपी के चक्कर में जो काम करते है उससे सामने वाले के दिल पर क्या बीतती है....न्यूज़ चैनल वालो के लिये सबसे बड़ी खबर वॉलीवुड से होती है...अगर मुंबई में किसी कलाकार को छींक आ गयी तो ये लोग पूरे मुंबई के तापमान का पोस्टमॉर्टम कर देंगे....लेकिन अगर उड़ीसा या फिर झारखंड में किसी नक्सली का कहर टूटेगा तो ये उस ख़बर को महज टिकर में अपडेट कर देते है......खैर रितिक रोशन जैसा मामला खली और कुछ दिन पहले टीम इंडिया के स्पिनर हरभजन सिंह के साथ हुआ.....अब देखने वाली बात ये होगी कि कभी सच्चाई को सामने लाने की मुहिम में लगी मीडिया अपने पुराने अस्तित्व में कब लौटेगी ।

आपका
विवेक मिश्रा

Monday, April 19, 2010

जानलेवा मोहब्बत...



एकखबर पढ़ने में आई कि जितने लोगों की जान गरीबी और बेरोजगारी ने नहीं ली उससे ज्यादा मोहब्बत ने ली है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक ही दिन दो प्रेमी युगलों ने खुदकुशी कर ली। इनकी चिता की आग अभी बुझी भी नही थी कि ग्रेटर नोएडा में भी एक प्रेमी युगल ने सल्फास खाकर आत्महत्या कर ली। बताया गया कि इन लोगों ने पारिवारिक लोगों की नाराजगी और परेशानियों की वजह से खुदकुशी कर ली। तीन दिन में प्रेमी युगलों की खुदकुशी की ये तीसरी घटना है। यह हमारे सामाजिक ढांचे और व्यवस्था पर सवाल उटाती है । आखिर प्रेम करनेवालों को खुदकुशी क्यों करनी पड़ती है? क्या उन्हें यह दुनिया अपने प्रेम के लिए रास नहीं आती या दुनिया ही उनके प्रेम को बर्दास्त नहीं कर पाती? कहनेवाले तो कहते हैं कि यह दुनिया किसी शेषनाग के फन पर नहीं, प्रेम से चलती और संवरती है। प्रेम गली अति सांकरी तो हमेशा से ही रही है और यह कोई खाला का घर भी नहीं हैं। प्रेम को पाने के लिए शीश उतारें भूंई धरे की स्थिति से गुजरना पड़ता है या आग का दरिया पार करना पड़ता है। प्रेम का दुश्मन जमाना शुरू से ही रहा है। फिर भी प्रेम करने वाले हैं कि रोके नहीं रुकते, वे प्रेम करते हैं और दुनिया भर की तमाम दुश्वारियां झेलते हुए खुद को होम कर देते हैं। लेकिन आज के आधुनिक समय में भी जब प्रेम करनेवाले को अपनी जानदेनी पड़े तो यह हमारे समाज-व्यवस्था के लिए शर्म की बात है।
हमारा समाज अपनी सामंती मानसिकता के कारण इन प्रेमी युगलों के प्रेम को मान्यता नहीं देना चाहता है और इन्हें तरह-तरह से लांछित करना चाहता है।इनके राह में सौ रोड़े अटकाता है। समाज के बेगाने रवैये से प्रेमीजनों को लगता है कि यह दुनिया उनके रहने लायक नहीं रह गई है। शायद दूसरे लोक में ही उनका मिलन संभव है। इसलिए अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद मिले सुसाइड नोट में यह लिखा मिलता है कि-साथ जी न सके लेकिन साथ मर तो सकते हैं- या दूसरी दुनिया में हम साथ-साथ रहेंगे, इसलिए यह दुनिया छोड़कर जा रहे हैं। इन प्रेमी युगलों को लगता है कि जिस दुनिया , जिस समाज और जिस परिवार में उनके प्यार की कोई कद्र नहीं उसमें क्यों जीना? और वे इस दुनिया के खिलाफ अपना प्रतिरोध दर्ज करने के लिए खुदकुशी का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं।
आखिरप्रेम करनेवालों का दुश्मन जमाना क्यों रहा है? क्योंकि प्रेम सामाजिक रूढ़ियों और उसकी व्यवस्था को चुनौती देता है। दरअसल हमारे समाज में पारिवारिक ढांचा आज भी सामंती किस्म का है। परिवार अपने पुराने मूल्यों और पुरानी नैतिकताओं के मानदंड पर ही टिका रहता है। प्रेम और शादी के मामले में वो चाहता है कि सबकुछ उनके मन के मुताबिक हो। इस मामले में वो बच्चों को कोई छूट नहीं देना चाहता। अपने बच्चों के लिए दुनिया भर की नेमतें हासिल करने को उत्सुक माता-पिता प्रेम और विवाह के मामले में अपनी ही पसंद, अपनी ही जिद पर अड़े रहना चाहता है। खाप पंचायतों का फरमान इसका ज्वलंत उदाहरण है। खाप पंचायतों के फरमान के कारण न जाने कितने प्रेमी युगलों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। लेकिन आज के युवा इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। वे दुनिया की तमाम हलचलों से पल-पल वाकिफ रहते हैं। सूचना क्रांति ने उन्हें न केवल अपने नागरिक जीवन के अधिकारों से अवगत कराया है बल्कि समाज की दकिनूसी परंपराओं से लड़ने का होसला भी दिया है। आज के युवा अपने अधिकारों के लिए सजग हैं और प्रेम या विवाह जैसे मसलों को अपना निजी मामला समझते हैं। इसमें वे किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहते। उन्हें पता है कि प्रेम निजी मामला है और संविधान की धारा इक्कीस के तहत यह उनके जीने की स्वतंत्रता का अधिकार है। लेकिन माता-पिता अपने बच्चे के विवाह को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते हैं। वे अपने बच्चे को प्रेम के संक्रमण से बचाने के लिए साम-दाम, दंड-भेद जैसे तमाम हथकंडे अपनाते हैं।
यहांसवाल ये भी उठता है कि क्यों नहीं माता-पिता अपने बच्चों के मन की भावनाओं को समझ पाते हैं? इसके पीछे भी तथाकथित नाक के कटने की मानसिकता काम करती है। हमारे समाज में जाति, वर्ग और सामाजिक रुतबे को खतरनाक हद तक मान्यता मिली हुई है। लेकिन पश्चिमी देशों में ऐसा नहीं है। वहां व्यक्ति स्वातंत्र्य को तरजीह दी जाती है। सांवैधानिक रूप से समय के साथ हरेक समाज के मूल्यों में परिवर्तन होता रहता है। लेकिन हमारा समाज आज भी सदियों पुरानी नैतिकताओं और मूल्यों पर टिका हुआ है। अठारह वर्ष के युवा को सांवैधानिक रूप से आज देश का शासक चुनने का अधिकार प्राप्त है लेकिन यह विडबंना है कि हमारा समाज उसे अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार नहीं देना चाहता है। जब एक युवा अपने मन से देश के लिए योग्य नेता का चुनाव कर सकता है, अपने रोजगार और कैरियर का चुनाव कर सकता है तो अपने जीवन-साथी का चुनाव क्यों नहीं कर सकता? नहीं, दरअसल समाज के लिए मामला इन युवाओं के अधिकार को , उनके चुनाव की स्वतंत्रता को महत्व देने का नहीं है उन्हें अपनी तथाकथित नैतिकता और पुराने पड़ चुके मूल्यों की चिंता है। अपनी नाक बचाने की चिंता में वे बचपन के ही बच्चों के जीवन को कुंठित करने और अपने ढंग से आकार देने में लग जाते हैं और तरह-तरह के प्रतिबंध लगाते रहते हैं। लेकिन जहां बंदिशें ज्यादा रहती हैं वहीं प्रेम का बिरवा उगता है।
दूसराकारण हमारे समाज में स्त्री को, लड़कियों को वस्तु समझने का भी है। माता-पिता अपनी बेटियों को इज्जत समझते हैं और उसकी यौन शुचिता को लेकर चिंतित रहते हैं। यही कारण है कि वे उसे अपने मनपसंद युवक से ब्याह नहीं करने देना चाहते और दहेज देकर या बिना दहेज के दुहाजू वर के साथ जिंदगी भर के लिए बलात्कर भुगतने को अभिशप्त करते हैं। दुखद बात ये कि यह सब उस लड़की की भलाई के नाम पर किया जाता है।
जबतकहमारे समाज की मानसिकता में आधुनिक मूल्यों की प्रतिष्ठा नहीं होगी तब तक इस तरह के वारदात होते रहेंगे और प्रेमीजन अपनी जान कुर्बान करते रहेंगे।लेकिन यही इस मामले का सबसे दुखद पहलू है। जिन्हें इस समाज को जीने और प्रेम करने लायक बनाना चाहिए था वही इसे छोड़कर चले जाते हैं। यह सच है कि समाज उनके अधिकार की रक्षा नहीं करता लेकिन यह भी उतना ही सच है कि वे भी समा को सुंदर बनाने के अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ जाते हैं। क्यों कि किसी भी समाज की बेहतरी की िम्मेदारी सबसे ज्यादा युवाओं के कंधों पर ही होती है। दुनिया की दुश्वारियों से हारकर खुदकुशी करने को किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता है। आत्महत्या चाहे जिन परिस्थितियों में की गई हो उसे कायरता ही माना जाएगा। जरूरत है कि समाज अपनी मान्यताओं और नैतिकता के मानदंड को आधुनिक बनाए तथा युवा वर्ग भी अपने इस समाज के डर से भागें नहीं बल्कि इसे बदलने की कोशिश करें। इस समाज में रहकर ही प्रेमीजन समाज के पुराने मूल्यों और रूढ़ परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं, इससे भागकर नहीं।


रमण कुमार सिंह


लेखक- एक पत्रकार, साहित्यकार और कवि है...अगर आप जुड़ना चाहते है तो...इनके मेल आईडी kumarramansingh@gmail.com पर संपर्क कर सकते है....

आईपीएल मतलब गड़बड़घोटाला...




नमस्कार दोस्तो..
पूरे डेढ़ महीने तक चला आईपीएल का सफर अब आईपीएल खत्म होने के कगार पर है...लेकिन इन दिनों के बीच सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात ये है कि आईपीएल में क्रिकेट से बढ़कर विवाद ज्यादा बिका...आखिरी समय में तो मोदी और थरूर की जंग नें तो आईपीएल का सारा काला चिट्ठा ही खोल के रख दिया...मोदी जहां सुनंदा नाम की सुंदरी का सहारा ले रहे थे॥वहीं थरूर साउथ अफ्रीकी मॉडल गैब्रिएला के दामन को पकड़े थे... हां एक बात जरूर देखने को मिली, कि मोदी के कार्यालय में आयकर विभाग का छापा पड़ा तो ढ़ेर सारे दस्तावेज मिले जो कि मोदी के विपरीत जाते है....कुछ लोगो के मुताबिक क्रिकेट...क्रिकेट नही रह गया है...क्रिकेट बन गया है जुआ.. जी हां सुनंदा पुष्कर जैसे लोग इस जुए में पैसा लगाती है जिसका फल उनको दुगुना होता है...इस पूरे प्रकरण के बाद शशि थरूर को अपना विदेश राज्य मंत्री पद की कुर्बानी देनी पड़ी..जबकि ललित मोदी पर गाज गिरनी बाकी है....



ललित मोदी के बारे में...
ललित मोदी को आईपीएल के तीनो सीजन को सफलता पूर्वक चलाने का खिताब जरूर मिलना चाहिये....क्योंकि ये वही ललित मोदी है जो पिछले साल सुरक्षा को लेके गृहमंत्री पी. चिदंबरम का विरोध करके इस क्रिकेट के जुए को साउथ अफ्रीका में सफलता पूर्वक खेलवाये....वाकई में मोदी जी आप बधाई के पात्र है..लेकिन अगर आपके पैसे पर गौर फरमायें तो निकल के आता है कि....इन तीन सालो में आपके पास हर वो नई चीजे दिखी है जो एक अरबपति के पास होना चाहिये...ए दिगर की बात है कि आप खुद रईसो के श्रेणी में आते है..आपके पास ढ़ेरों कंपनिया है..लेकिन इन तीन सालो में आपके गैरेज में BMW, मर्सिडीज और प्राईवेट प्लेन जरूर बढ़े है..भाई मोदी साहब हर साख पे उल्लू बैठा है...आप जो पैसा इंडियन प्रीमियर लीग में बना रहे थे....उस पर सरकार की नज़र 2009 से ही लगी हुई थी...अभी तो और खुलासे बाकी है..देखने वाली बात ये होगी कि जेन्टलमैन वाले खेल क्रिकेट को जुआ बनाने वाले ये मोदी जैसे लोगों के पर कब कतरे जायेंगें.....

आपका
विवेक मिश्रा

Thursday, February 25, 2010

सचिन रिकॉर्ड तेन्दुलकर...


दोस्तो नमस्कार....

विश्व क्रिकेट में अगर सचिन की बात की जाये तो हर खिलाड़ी उनकी तारीफ ही करता है। खास करके जब उन्होनें वनडे में नाबाद दोहरा शतक लगाया तब....मास्टर की खासियत रही है कि वो जब भी मैदान पर उतरते है तब उनकी एक नयी अदा सामने आ जाती है। २४ अक्तूबर को ग्वालियर का रूप सिंह स्टेडियम में बैठा हर सचिन प्रेमी उनके इस कारनामा का गवाह बना है... साथ में खुद ग्वालियर का रूप सिंह स्टेडियम भी धन्य हो गया है.... क्योकिं क्रिकेट के भगवान ने साक्षात अपने असली रूप में आये। खुद मै भी उस महान क्षण का गवाह बना साथ में सचिन के दोहरे शतक पर लाइव चैट भी किया... दोस्तो सच में बता दूं कि हमने अपने पत्रकारिता में कई लाइव चैट कियें है...लेकिन मै बता दूं कि मेरी अब तक कि जिदंगी का ये लाइव चैट सबसे अहम रहेगा...पूरे आधे घंटे तक कैमरे के सामने मैं सचिन के नाबाद दोहरे शतक जड़ने पर उनका सचिननामा पढ़ता रहा। हमारी सहयोगी एंकर नें हमसे सवाल किया कि विवेक जी आप को कैसा महसूस हो रहा है............इस सवाल के बाद तो मानो मेरे गले से आवाज ही नही निकल रही थी... खुद मैं सचिन का बहुत बड़ा फैन हूं और इस महान पल को अपने लाइव चैट के दौरान अपने दर्शको से रूबरू करा रहा था॥लेकिन इस सवाल के बाद मेरी आखों से आंसू निकल पड़े किसी तरह से मैनें अपने आप को रोका...लेकिन हमारे सहयोगी लोग भांप गये थे कि अब मैं पूरी तरह से रो दूंगा॥लेकिन मैनें अपने आप को संभाला और सचिननामा पढ़ता रहा... दोस्तो यहां पर बता दें कि अगर हिन्दी पत्रकारिता के महात्मा गांधी प्रभाष जोशी जो कि सचिन के महान प्रशंसको में से एक थे......अगर वो जिंदा होते तो उनकी खुशी का ठिकाना ना रहता....क्रिकेट और सचिन पर प्रभाष जी के लेख वाकई में लाजवाब होते थे....खुद मै भी उनके आर्टिकिल से प्रेरणा लिया करता था...और सचिन भी.....अब सचिन से उम्मीद है कि वो अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में अपने सौ शतक पूरा करे...


आपका

विवेक

Sunday, January 24, 2010

आईपीएल पर गरमा - गरमी...




दोस्तो नमस्कार.....
बहुत दिन हुआ कुछ लिखे सोचा कुछ लिंखू..... इन दिनो काफी बिजी था....कुछ खास हो भी नही रहा है। जेनेश्वर जी चले गये सो उनको जाना था उम्र हो गयी थी.... लेकिन उनका जाना इसलिये खल गया कि वो लोहिया के आखिरी चिराग कहे जाते थे जो बुझ गया....खैर मरना जीना तो लगा रहता है॥ अब बात की जाये ताजा उबाल कि जी हां ताजा मामला ये है कि आईपीएल आ गया है ... बोली भी लग गयी है... और सबसे बड़ी बात ये है कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों की बोली लगाने कि किसी फ्रैंचाईजी ने जहमत नही उठाई....भाई उठाता भी क्यों... इस उठाने के पीछे कई कारण है...एक तो पाकिस्तान का आंतकवादी रवैया और दूसरका उन पाकिस्तानी खिलाड़ियों की भारत में सुरक्षा... खैर बोली न लगने के पीछे एक लिखित कारण ये भी है कि उन खिलाड़ियों का दाम कुछ ज्यादा था। अफरीदी कि बात करे तो उनकी बोली लगाना शायद किसी टीम के बस की बात नही थी.... अब अफरीदी साहब कि बोली ना लगने से वो नाराज हो गये है.... साथ में अपने बोर्ड को भी अपनी नाराजगी में शामिल कर लिये है...पड़ोसी पाक तो हमेशा से ही भारत के खिलाफ कोई ना कोई मुद्दा तलाशता रहता है वो मुद्दा मिल भी गया....अफरीदी वाले मामले पर पाकिस्तान में बवाल मच गया है .... एक ओर तो भारत-पाक का रिश्ता तल्ख है तो दूसरी ओर आग में घी डालने का काम अफरीदी कर गये....अब पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड इस पूरे मामले का छिछालेदर कर दिया है मामला कुछ रंग कुछ और का दे दिया गया है। पाकिस्तान बोर्ड के मुताबिक आईपीएल ने पाकिस्तान की तौहीन कि है.... और इस मामला के बाद कुछ पाकिस्तानी सांसद अपना भारत दौरा भी रद्द कर दिये है... अब खबर ये है कि पाकिस्तान में आईपीएल का प्रसारण भी बंद कर दिया जायेगा....भाई क्रिकेट का कोई मजहब नही होता धर्म नही होता है .... अगर होता है तो केवल इंज्वाय.............................




आपका


विवेक

Tuesday, November 10, 2009

शीला ये तूने क्या किया...




दो तीन दिन पहले दिल्ली की बसो में सफर करते हुए अचानक सुनने को मिला कि अब पांच रूपये की जगह दस रूपये का टिकट लगेगा....भाई मैंने पूछा क्या बात है तो जवाब मिला कि शीला का एलान है टिकट तो लगेगा ही....भाई मैंने फिर पूछा कि क्या इसीलिये सरकार बनवाया गया था...फिर जवाब आया टिकट लेले ...कानून ना समझा...खैर किसी तरह मन मसोस कर पैसा निकाला और बरबस मुंह से निकल आया कि ये शीला तूने क्या किया.........


डीटीसी बसो का किराया बढ़ाने के पीछे शीला की दलील थी कि हर महीने डीटीसी घाटे में जा रही थी .....इसलिये किराया बढ़ाना लाजिमी है...भाई हम पूछते है कि पचास परसेन्ट बढ़ाना तो लाजिमी नहीं था...एक रूपया बढ़ाओ दो रूपया बढ़ाओ एक साथ पांच रूपया बढ़ाने के पीछे क्या वजह थी....खैर जहां पंद्रह से बीस रूपये में ऑफिस पहुंचा करते थे अब वो दायरा पच्चीस से तीस रूपये तक पहुंच गया है....दिल्ली में बढ़ रही महंगाई के पीछे कॉमनवेल्थ गेम में हुए खर्च को जोड़ के देखा जा रहा है ...लेकिन यहां पर सबसे बड़ा सवाल ये निकल के आ रहा है कि आखिर हम सरकार चुनते क्यों है....क्या इसीलिये कि जब भी जहां पर ज्यादा खर्च हो वहां पर भरपाई के लिये हर चीज को मंहगी कर दे....आखिर इसी दिन के लिये सरकार को चुना जाता है....नब्बे रूपये दाल तीस का आलू चालीस की चीनी... आटे का भाव पता नही कहां जा पहुंचा हैं.....दिल्ली में इतनी आसानी से मंहगाई को सरकार बढ़ा देती है कोई विरोध करने को आगे आता ही नहीं क्या दिल्ली वालो को सांप सूघ गया है....या फिर विपक्ष नकारा हो गया है......
मैट्रो का किराया अभी बाकी है दोस्त..........
आपका विवेक

Thursday, November 5, 2009

चले गये दद्दा...


हिन्दी पत्रकारिता के पितामह प्रभाष जोशी हमारे बीच में नहीं है..................

खबर सुनते ही लगा कि धरती डोलने लगी...भूकंप आ गया....ऐसा लगा कि हिन्दी पत्रकारिता अब खत्म हो गयी.....

इलाहाबाद से दिल्ली चला था तो एक इच्छा थी कि लेखनी के इस दद्दा से मिलू...अब ये इच्छा कभी पूरी नहीं होगी । क्रिकेट के प्रति उनकी दीवानगी का आलम ये था कि भारत का कोई मैच वो मिस नही करते थे। शायद ये दीवानगी ही उनको इस दुनिया से रुखसत कर गयी...जोशी जी सचिन के महान प्रशसंको में से एक थे। उनकी एक आर्टिकिल याद आ रही है..... जब सचिन नर्वस नाइन्टी के शिकार होते थे तब उन्होने एक लेख लिखा था....उसमें अपनी भावनाओ को पूरा उकेर कर लिख दिया था...उन्होनें लिखा था जब सचिन अस्सी या नब्बे के करीब पहुंचते थे तब मै अपनी टीवी बंद कर दिया करता था...शायद उनका शतक बन जाये...सचिन के प्रति उनकी अल्हड़ता इतनी थी कि वो ऐसे टोटका कर दिया करते थे....अगर वो आज होते तो सचिन के सत्रह हजार रन बनाने पर ऐसा आर्टिकिल लिखते कि मन बाग-बाग हो जाता। जोशी जी आज हमारे बीच नही है लेकिन उनकी लेखनी उनका आदर्श उनका कलम आंदोलन सब कुछ हमारे जेहन में अमर रहेगा। बाकी उनके बारे में और लिखने कि हिम्मत नहीं हो रही क्योंकि मन बहुत भावुक हो रहा है...


आपका

विवेक

Tuesday, September 1, 2009

फुटबॉल का दर्द...






फुटबॉल एक ऐसा खेल जिसको पैर से खेला जाता है.... इसको लात से भी मारा जाता है..... शायद क्रिकेट के क्रेज से इसको हर कोई लात से ही मार रहा है। इस खेल में खिलाडी़ जितना भी फुटबॉल को लात मारता है खेल में उतना ही मजा आता है। लेकिन फेडरेशन और प्रशासन का उदासीन रवैया के चलते ये खेल आज हासिये पर है। फुटबॉल को लात पड़ रहा है आज के भ्रष्ट प्रशासन का..... साथ में फेडरेशन का जहां पर देखिये भ्रष्टाचार ही इस खेल पर हावी..... आखिरकार राजनीतिक हलके के लोग क्यों इन खेलो पर कुदृष्टि रखे है.....क्यों संसद के गलियारे में चिल्ल-पों करने वाले राजनेता खेल के मैदान पर अपनी हेकड़ी निकालते है....जवाब ये निकल के आता है फेडरेशन में आने वाले सरकारी पैसा इन राजनेताओं को अपनी ओर खींचता है। खैर इस फुटबॉल को जिसको भूटिया का नेतृत्व दूसरी बार सरताज बनाया है उसका हाल बेहाल हो गया है। प्रफुल्ल पटेल जो कि एक राजनेता है उनका नेतृत्व फेडरेशन में एक राजनेता से इतर कुछ भी नहीं है। भारत में यहीं नेहरू कप है जो १९९७ से २००७ तक हासिये पर था....खैर ओएनजीसी की मदद कहे या फिर सरकार का शिगूफा.....नेहरू कप फिर से शुरू हुआ....और भूटिया ने दूसरी बार सीरिया को हरा कर कप पर कब्जा किया.....भारत में राजनीति हर गली और कुचे में देखी और समझी जा सकती है। उसका परिणाम खेल के मैदान में भी देखने को मिलता है..... किसी भी फेडरेशन की बात करे तो हर जगह इन राजनेताओं की एक अच्छी खासी जमात देखने को मिल जायेगी....लेकिन भारतीय फुटबॉल टीम की दूसरी जीत को देख के लगता है कि इसको एक संजीवनी की जरूरत है।

आपका

विवेक

Thursday, July 23, 2009

भारत में भारतीय खेलों की उपेक्षा....


नमस्कार दोस्तों.....
खैर आज वक्त मिला तो सोचा कि कुछ लिख ही दूं। आज बुलेटिन दे रहा था तो एक खबर आई कि ... हॉकी खिलाड़ियों की उपेक्षा की गई। हॉकी खिलाड़ियों के साथ इस तरीके का दुर्व्यवहार स्पोर्ट्स एथारिटी के ओर से किया गया। दरअसल पूरा मामला ये है कि भारतीय महिला और पुरूष टीम पुणे से दिल्ली आ रहे थे, जिनको लेने के लिये भारतीय खेल प्राधिकरण खिलाड़ियो के लिये होटल में बस नहीं भेजा.. वो खिलाड़ी लोग अपने द्वारा किये गये साधन से होटल से गतंव्य स्थान तक पहुंचे। खैर ये कोई नया मामला नहीं है जब इस तरह से भारतीय हॉकी खिलाड़ियो के साथ बदसलूकी की गयी हो। यहां पर सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात ये है कि हॉकी भारत का राष्ट्रीय खेल है। जब राष्ट्रीय खेल के साथ ऐसा किया जा सकता है तो किसी भी खेल के साथ ऐसा हो सकता है...भारत में तीरंदाजी हो..कबड्डी हो या फिर कोई भी खेल....जिनका विश्व पटल पर महत्व होता है..इन खेलों के साथ हमेशा से नाइंसाफी ही हुई है...क्रिकेट के इस देश में कभी हॉकी का वर्चस्व होता था...जमाना बदला लोग बदले बदल गया खेल का स्वाद..जहां भारत के गांवो में हॉकी बांस के डंडे से खेला जाता था..आज उसकी जगह लकड़ी का बल्ला ले लिया है..इस मामले पर चिंतित होना लाजिमी है...क्योंकि आने वाले ओलंपिक में स्वर्ण...कांस्य ..रजत जैसे पदक इन्ही खेलो से मिलते है... चीन ...अमेरिका..जापान जैसे देश अपने यहां इस तरीके के खेलों पर पूरा ध्यान देते है...जिससे कभी भी ओलंपिक में उन देशों का स्थान सोना और चांदी लाने में नंबर एक पर होता है।
आपका
विवेक

Friday, July 3, 2009

हमारी बिहार यात्रा.....

नमस्कार दोस्तों......
वैसे हमारी बिहार यात्रा एक बार हो चुकी है....ये हमारी दूसरी यात्रा थी। हमारे ही सहयोगी नवीन की शादी में पटना जाने का सौभाग्य मिला... सोचा बहुत था कि पटना कैसा होगा? क्योंकि पटना के बारे में मन में बहुत कुछ भ्रांतियां थी। मेरी समझ में आ रहा था कि पटना शहर कैसा होगा... लेकिन मेरी समझ उसी समय काफूर हो गयी जब मैं स्टेशन पर पहुंचा ... इतनी साफ-सफाई कि फर्स आईना का काम कर जाये...सलीके वाले लोग... लगा कि लखनऊ या इलाहाबाद के स्टेशन पर हूं।
शुरूआत करते है अपनी यात्रा से,,, मेरे साथ में हमारे मुंहबोले बड़े भाई संजीव सिंह और प्रशांत सिंह थे... साथ में दूरदर्शन के माननीय पत्रकार अतुल मिश्रा जी थे... अतुल जी थोड़ा बड़बोले किस्म के पत्रकार है। जिंदगी के बारिकीयों को नजदीक से देखते है लेकिन समय की पांबदी से कोई वास्ता नही है अतुल जी का... हां साथ में दो बड़े भाई हो तो क्या कहने... प्रशांत भैया और संजीव भैया से जिंदगी की बारिकीयों को नजदीक से सीखने का मौका मिला है। स्टेशन पर सबसे पहले संजीव भैया पहुंचे थे....फिर मैं...फिर प्रशांत भैया और अंत में माननीय अतुल......
खैर ट्रेन चल चुकी और शुरू हो गया मस्ती का दौर... इतने दिन बाद हम लोग एक साथ मिले थे तो मस्ती लाजिमी थी। गप शप के दौर में समय का पता ही नहीं चला फिर प्रशांत भैया के घर से डिनर आया था... छक के भोजन किया गया... मजा आ गया था। ट्रेन में मस्ती का दौर भी खूब चला॥ रास्ते में बिहार दर्शन.... खेत खलिहान... धान की रोपाई के लिये तैयार हो रहे खेत.... नदी... नाले... नहर सब कुछ था रास्ते में .... भाई दिल्ली में कहा देखने को मिलता है ये सब.... ढंग से आसमान भी नही दिखता दिल्ली में.....
लालू के समय में एक बार सोनपुर गया था ... दोस्त की बहन की शादी थी... करीब दस साल पहले... हालांकि पटना यात्रा में खूब मजा आया ... पटना शहर की खूबसूरती मन को मोह ली.... भाई दिल्ली कभी अपनी-अपनी नहीं लगी... लेकिन पटना से तो जैसे प्यार हो गया... सलीके वाले लोग.... टैक्सी वाला... होटल वाला.... सब कोई सलीके वाले..... खैर नीतीश सरकार द्वारा बनाये गये फ्लाई ओवर और ढंग के सड़क सब कुछ बढ़िया था......
दोस्तों दूबारा मौका लगेगा तो पटना जरूर जाऊंगा.....

आपका
विवेक

Monday, May 25, 2009

जीत गया डेक्कन......


दोस्त

आखिरकार आईपीएल का महाजंग ख़त्म हो गया है... और डेक्कन चार्जर्स को छ रन से जीत मिल गई है । बंगलोर रायल को हरा के डेक्कन ने एक इतिहास कायम कर दिया है । गौर करने वाली बात ये है की यही दोनों टीमे थी जो पिछले बार सबसे कमजोर टीम रही थी । जम्बो की कप्तानी कहे की गीली का आत्मविश्वास दोनों ही तारीफ की चोटी पर है । रोमांचक मुकाबले में मेरे साथ - साथ मेरी पुरी टीम आकलन लगा रही थी की कौन जीतेगा कौन हारेगा लेकिन परिणाम तक कोई नही पहुच पा रहा था । भाई आईपीएल है हर गेंद पर करिश्मा कुछ भी हो सकता है ? लेकिन हुआ ही कुछ ऐसा सब कुछ बढ़िया चल रहा था लेकिन लेकिन 15वें ओवर में सायमंड्स ने दो गेंदों पर रॉस टेलर और विराट कोहली को आउट कर दिया.... बस डेक्कन जीत की ओर बढ़ता चलता गया । पुरे मैच में जम्बो के फिरकी का अंदाज देखने लायक था कुम्बले के हाथ में कुल चार विकेट था ... उनके ही द्वारा लिए गए विकेट से डेक्कन टीम बैकफुट पर आ गई थी । लेकिन अन्तिम समय पर डेक्कन टीम को ही जीत मिली ..... अब आगे टी ट्वेंटी वर्ल्ड कप की रणनीति बनानी है ।


आपका दोस्त


विवेक

Saturday, May 23, 2009

आईपीएल में मेरी भूमिका.....


इंडियन प्रीमियर लीग को कोई इंडियन पैसा लीग कहा तो कोई इंडियन लव लीग...... लेकिन हम कहते है कि ये एक बड़ा एक्सपोजर है उन खिलाड़ियों के लिये जिनको नेशनल टीम में चांस नही मिलता। हमारे देश में क्रिकेट का इतना क्रेज है कि लोग क्रिकेटरो को भगवान की तरह भी है कहीं- कहीं पूंजते है। दोस्तो आईपीएल अब आगाज से अंजाम की ओर है तो कुछ तसल्ली हो रही है साथ में कुछ फुर्सत का एहसास.... स्पोर्ट्स बीट पर तो यही सब खबर रही है कि .... कौन जीत रहा है कौन हार रहा है.... लेकिन फाइनल की जंग में कौन जीतेगा कहना थोड़ा मुश्किल है लेकिन कुछ अप्रत्याशित सा ही परिणाम आयेगा। खैर मुझे क्या लेना है हम तो पत्रकार है जो भी होगा खबर निकालेंगे, आईपीएल के बाद ही टी ट्वेन्टी विश्व कप शुरू होने वाला है जिसमें भी हमें जूझना ही होगा ... हां एक बात और गौर करने वाली है कि इस बार मंहगे खिलाड़ियों की एक ना चली.... चले वही जो सस्ते थे या फिर वो जिनका नाम कम था, अभी डेक्कन और बैंगलोर के जंग में मनीष पांडे जैसे खिलाड़ी का शतक इस बात का गवाह है, साथ में कामरान खान अभिषेक नायर भी इस फेहरिस्त को लंबा बढ़ाते है। खबरिया चैनल की एक ख़ास बात ये होती है कि क्रिकेट के खबर को चटखारा लेकर ही दिखाते है.... हम भी वही करते है भाई टीआरपी का जो सवाल है... चलिये आईपीएल की खबर करके मजा खूब आया...भाई पूरे महीने नाइट शिफ्ट काम करके अब दिन में काम करने का मजा ही कुछ और है।

आपका
विवेक

Friday, April 10, 2009

जुते का साइड इफेक्ट...




जनाब ये बात लिखते हुये ताज्जुब हो रहा है, लेकिन लिखना पड़ रहा है.......
कभी समाज में गाली खाने वाला जूता अब राजनीतिक हलके का एक सम्माननीय परिचय हो गया है। समाज में जुते का सम्मान इस कदर बढ़ गया है कि जहां देखो लोग जुता पर जुता दिये जा रहे है। कहीं बुश जुता खा रहे है तो कही चिदंबरम.....अब सिलसिला नवीन जिंदल तक पहुंच गया है। समाज में लोग को गाली देते हुये आप बहुत सुने होगें कि ....अब बोलोगे तो जूते से मारूगां ..... कितना हेय दृष्टि से लोग जूते को देखते थे। अब जूते का रूतबा बढ़ गया है। अब जूते से मार खाने वाले की पब्लिसिटी बढ़ रही है साथ में मारने वाले को एक वर्ग विशेष में अच्छा खासा इज्जत....
दो जूते आपस में बात कर रहे थे कि ....
(पहला जूता यार अब तो हमे इज्जत मिल रही है....कहीं ये नेता लोगो की चाल तो नहीं है?
दूसरा जूता हां यार सही कह रहे हो....ये नेता लोगो की कोई चाल हो सकती है....क्योंकि एक मारता है तो उसको लोग टिकट देने की बात करते है .... तो दूसरी तरफ एक का टिकट कट जाता है....ये नेता लोग अब हमारी कौम में भी दखल देने लगे है......)
दोस्तों अब चलते - चलते ये बात स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि अब जूते का वैल्यू बढ़ गया है ..... चप्पल पहनना छोड़ दीजिये ॥ हो सकता है कही जूता आपको टिकट ना दिलवा दे....लोकसभा चुनाव सिर पर है......।