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Monday, December 5, 2011

अभी न जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं.......


रविवार की सुबह देर से सो कर हमेशा उठने की आदत रही है..वैसा ही इस रविवार को भी हुआ.. लेकिन बिस्तर पर दूसरे कमरे से आ रही टेलीविजन की आवाज़ और देव साहब के द्वारा फिल्माए गए गीतों की लगातार आ रही धुन बहुत अच्छी लग रही थी लेकिन कुछ अनहोनी होने का अंदेशा भी मन में उठ रहा था.....कि आज ऐसा क्या हुआ की इतने अच्छे गानों से सुबह हो रही है.. आनन- फानन में उठा और जिस बात का डर था वही हुआ... 1०० से अधिक फिल्मों में अपने अभिनय से मंत्रमुग्ध कर देने वाले पद्मा भूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कारों से सम्मानित धर्मदेव आनंद, जो कि देव आनंद के नाम से प्रसिद्ध हैं, उनका निधन हो गया ...देव साहब के निधन से लगता है की जिन्दा-दिली ने जिंदगी को अलविदा कह दिया...देव साहब ने जिंदगी के फलसफे को परदे पर और वास्तविक जीवन में भी जिया है... उनके जाने से लगता है कि हमने अपने जीवन से अपने गाइड खो दिया और जिंदगी का साथ निभाने वाला आज जिंदगी छोड़ कर चला गया.... आपके जाने से अब यह गाना बेमानी लगने लगा है...देव साहब ने हिन्दुस्तानी मर्दों को ख़ूबसूरती का सलीका सिखाया... वो ऐसे सख्शियत रहे हैं जिनकी ख़ूबसूरती की चर्चा नर्गिस और मधुबाला से ज्यादा हुई है ... इस हर दिल अज़ीज़ कलाकार को फिल्म इंडस्ट्री में चाकलेट हीरो के रूप में मान्यता मिली और उन दिनों में मशहूर हुए तीन सुपरस्टार त्रिमूर्ति के त्रिकोण, दिलीप कुमार और राज कपूर ,का तीसरा कोण थे. तीनों नें अपने-अपने अलग मकाम बनाये, और पहचान स्थापित की...देव साहब ने अपने अभिनय के द्वारा हमें उस नायक से मिलवाया जो रोमान्स और प्रेम की मन मोहनी दुनिया में हमें ले जाता है, और भावना के नाजुक मोरपंखी स्पर्श से हमारे वजूद में रोमांस को चस्पा करता है.... यह वह सपनों का राजकुमार था जिसका जन्म ही प्यार करने को हुआ था. एक ऐसा व्यक्तित्व जो मन को गुदगुदानेवाला, आल्हादित करने वाला था जिसे सदा ही जवां मोहब्बत का वरदान मिला हुआ है. युवतियों के दिलों का ताज और युवकों के रोल मॉडल के रूप में देव बखूबी सराहे गए.... अपने समकालीन नायकों दिलीप कुमार और राज कपूर से अभिनय क्षमता में देव साहब उन्नीस ज़रूर थे, मगर लोकप्रियता (विशेषकर महिलाओं में)और करिश्माई व्यक्तित्व के मामले में इक्कीस थे.... देवसाहब की डायलॉग डिलीवरी का भी अलग ही अंदाज़ रहा है, और उनका यही अंदाज उन्हें दूसरे नायको से अलग लाकर खड़ा कर देता है..... जिंदगी का साथ उन्होंने बड़ी ही जिन्दादिली से दिया है और देवानंद जी ने फिल्म इंडस्ट्री में तीन पीढ़ियों के साथ काम करके अपने अभिनय और निर्देशन का लोहा मनवाया है उन्होंने हमेशा सामाजिक विषयों पर फ़िल्में बनाने में यकीन किया... उदाहरण के लिए प्रेम पुजारी और हरे राम हरे कृष्णा जैसी फ़िल्में थी जो लीक से हट कर थी...कुछ वर्ष पहले उन्होंने 'रोमांसिंग विद लाइफ' नाम से अपनी जीवनी बाजार में उतारी थी। आमतौर पर मशहूर हस्तियों की जीवनियों के प्रसंग विवादों का विषय बनते हैं लेकिन उनकी जीवनी हर अर्थ में बेदाग रही बिल्कुल उनके जीवन की तरह। देव साहब भारतीय सिनेमा में हमेशा से शहरी आधुनिक युवा के प्रतिनिधि रहे हैं और आज भी उनके व्यक्तित्व में युवा ऊर्जा और चपलता मौजूद थी। उम्र के इस मोड़ पर भी उनकी सक्रियता देखने को मिलती थी... 88 वर्षीय देव साहब खुद ही कहा करते थे की कि दिल जवां हो तो उम्र कभी आड़े नहीं आती......लेकिन खबरें कह रहीं हैं देव साहब अब आप इस दुनिया में नहीं रहे. लेकिन जो देवानंद नहीं रहे, वो तो मेरे लिए थे भी कभी नहीं... क्योंकि मैंने उन्हें कभी बाबदन देखा ही नहीं. जो देवानंद मेरे लिए थे वो हैं और इंशाल्लाह रहती दुनिया तक रहेंगे. वो एक अंदाज़ एक आवाज़ थे जो रूह की भाषा में गुफ़्तगू करते थे….. देव जी आप चोला बदल सकते हैं. लेकिन चाहने वालों के दिल से निकलना आपके भी हाथ में नहीं है. आप भागने की नाहक कोशिश कर रहे हैं. आपके वजूद का एक हिस्सा हमारे दिल की कफ़स में हैं. हम आपतक महदूद हैं और आप हम तक ।

अतुल कुमार मिश्र
रिसर्च मैनेजर
इंडिया न्यूज़

(नोट - लेखक से आप इंडिया न्यूज में संपर्क कर सकते हैं । )

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