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Monday, December 5, 2011

अभी न जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं.......


रविवार की सुबह देर से सो कर हमेशा उठने की आदत रही है..वैसा ही इस रविवार को भी हुआ.. लेकिन बिस्तर पर दूसरे कमरे से आ रही टेलीविजन की आवाज़ और देव साहब के द्वारा फिल्माए गए गीतों की लगातार आ रही धुन बहुत अच्छी लग रही थी लेकिन कुछ अनहोनी होने का अंदेशा भी मन में उठ रहा था.....कि आज ऐसा क्या हुआ की इतने अच्छे गानों से सुबह हो रही है.. आनन- फानन में उठा और जिस बात का डर था वही हुआ... 1०० से अधिक फिल्मों में अपने अभिनय से मंत्रमुग्ध कर देने वाले पद्मा भूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कारों से सम्मानित धर्मदेव आनंद, जो कि देव आनंद के नाम से प्रसिद्ध हैं, उनका निधन हो गया ...देव साहब के निधन से लगता है की जिन्दा-दिली ने जिंदगी को अलविदा कह दिया...देव साहब ने जिंदगी के फलसफे को परदे पर और वास्तविक जीवन में भी जिया है... उनके जाने से लगता है कि हमने अपने जीवन से अपने गाइड खो दिया और जिंदगी का साथ निभाने वाला आज जिंदगी छोड़ कर चला गया.... आपके जाने से अब यह गाना बेमानी लगने लगा है...देव साहब ने हिन्दुस्तानी मर्दों को ख़ूबसूरती का सलीका सिखाया... वो ऐसे सख्शियत रहे हैं जिनकी ख़ूबसूरती की चर्चा नर्गिस और मधुबाला से ज्यादा हुई है ... इस हर दिल अज़ीज़ कलाकार को फिल्म इंडस्ट्री में चाकलेट हीरो के रूप में मान्यता मिली और उन दिनों में मशहूर हुए तीन सुपरस्टार त्रिमूर्ति के त्रिकोण, दिलीप कुमार और राज कपूर ,का तीसरा कोण थे. तीनों नें अपने-अपने अलग मकाम बनाये, और पहचान स्थापित की...देव साहब ने अपने अभिनय के द्वारा हमें उस नायक से मिलवाया जो रोमान्स और प्रेम की मन मोहनी दुनिया में हमें ले जाता है, और भावना के नाजुक मोरपंखी स्पर्श से हमारे वजूद में रोमांस को चस्पा करता है.... यह वह सपनों का राजकुमार था जिसका जन्म ही प्यार करने को हुआ था. एक ऐसा व्यक्तित्व जो मन को गुदगुदानेवाला, आल्हादित करने वाला था जिसे सदा ही जवां मोहब्बत का वरदान मिला हुआ है. युवतियों के दिलों का ताज और युवकों के रोल मॉडल के रूप में देव बखूबी सराहे गए.... अपने समकालीन नायकों दिलीप कुमार और राज कपूर से अभिनय क्षमता में देव साहब उन्नीस ज़रूर थे, मगर लोकप्रियता (विशेषकर महिलाओं में)और करिश्माई व्यक्तित्व के मामले में इक्कीस थे.... देवसाहब की डायलॉग डिलीवरी का भी अलग ही अंदाज़ रहा है, और उनका यही अंदाज उन्हें दूसरे नायको से अलग लाकर खड़ा कर देता है..... जिंदगी का साथ उन्होंने बड़ी ही जिन्दादिली से दिया है और देवानंद जी ने फिल्म इंडस्ट्री में तीन पीढ़ियों के साथ काम करके अपने अभिनय और निर्देशन का लोहा मनवाया है उन्होंने हमेशा सामाजिक विषयों पर फ़िल्में बनाने में यकीन किया... उदाहरण के लिए प्रेम पुजारी और हरे राम हरे कृष्णा जैसी फ़िल्में थी जो लीक से हट कर थी...कुछ वर्ष पहले उन्होंने 'रोमांसिंग विद लाइफ' नाम से अपनी जीवनी बाजार में उतारी थी। आमतौर पर मशहूर हस्तियों की जीवनियों के प्रसंग विवादों का विषय बनते हैं लेकिन उनकी जीवनी हर अर्थ में बेदाग रही बिल्कुल उनके जीवन की तरह। देव साहब भारतीय सिनेमा में हमेशा से शहरी आधुनिक युवा के प्रतिनिधि रहे हैं और आज भी उनके व्यक्तित्व में युवा ऊर्जा और चपलता मौजूद थी। उम्र के इस मोड़ पर भी उनकी सक्रियता देखने को मिलती थी... 88 वर्षीय देव साहब खुद ही कहा करते थे की कि दिल जवां हो तो उम्र कभी आड़े नहीं आती......लेकिन खबरें कह रहीं हैं देव साहब अब आप इस दुनिया में नहीं रहे. लेकिन जो देवानंद नहीं रहे, वो तो मेरे लिए थे भी कभी नहीं... क्योंकि मैंने उन्हें कभी बाबदन देखा ही नहीं. जो देवानंद मेरे लिए थे वो हैं और इंशाल्लाह रहती दुनिया तक रहेंगे. वो एक अंदाज़ एक आवाज़ थे जो रूह की भाषा में गुफ़्तगू करते थे….. देव जी आप चोला बदल सकते हैं. लेकिन चाहने वालों के दिल से निकलना आपके भी हाथ में नहीं है. आप भागने की नाहक कोशिश कर रहे हैं. आपके वजूद का एक हिस्सा हमारे दिल की कफ़स में हैं. हम आपतक महदूद हैं और आप हम तक ।

अतुल कुमार मिश्र
रिसर्च मैनेजर
इंडिया न्यूज़

(नोट - लेखक से आप इंडिया न्यूज में संपर्क कर सकते हैं । )

Sunday, November 20, 2011

विभाजन का खेल- कौन पास कौन फेल ?......



उत्तर प्रदेश की मुखिया बहन मायावती, जो लगातार अपने मंत्रियो के भ्रष्टाचार के आरोपों और विपक्ष के लगातार दबाव से घिरी दिख रही थी, आखिर अपना नया राजनीतिक दांव खेल दिया... जिससे देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश चार भागों (अवध प्रदेश, पूर्वांचल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड) में विभाजित करने की बात कही है... बहन जी ऐसी पहली मुख्यमंत्री होंगी जो सत्ता में रहते हुए भी प्रदेश बटवारे की मांग उठाई हैं... बहन जी का यह दांव जिसके लिए न कभी प्रदेश में कोई राजनीतिक आन्दोलन हुआ और न ही कभी प्रदेश के रहने वालों ने इसके लिए आवाज़ बुलंद की जिस प्रकार पृथक तेलंगाना के लिये किया गया है... हाँ यदा कदा अमर सिंह जैसे नेताओं ने राजनैतिक रोटियाँ सेकने के उद्देश्य से अलग पूर्वांचल की और बुंदेलखंड के कुछ स्थानीय गुटों ने अलग बुंदेलखंड की आवाज़ जरूर उठाई थी... सन 1947 में अस्तित्व में आए उत्तर प्रदेश को जो पहले यूनाइटेड स्टेट ऑफ़ प्रोविंस एंड अवध था, विकेंद्रीकरण के इस खेल बाद निश्चित रूप से बहन जी के लिए राजनितिक दृष्टिकोण से बहुत ही लाभदायक सिद्ध होगा... जाहिर है बहन जी कोई नौसिखिया राजनीतिज्ञ नहीं है और प्रदेश विभाजन से सबसे ज्यादा फायदा मिलने की बात हो तो बहन जी की बहुजन समाज पार्टी सबसे पहले पायदान पर दिखेंगी और यह निश्चित रूप से विभाजन का यह खेल राजनैतिक फायदे के लिए किया गया है... वहीं अगर विपक्षी दलों की बात करें तो प्रदेश विभाजन के इस खेल को सियासी दांव बता रहे है , वहीं राजनीतिक आंकड़ो के लिहाज़ से अगर बात की जाय तब भी प्रदेश विभाजन के पश्चात बहन जी को राजनीतिक लाभ मिलता दिखाई पड़ रहा है... क्योंकि वर्तमान समय में अगर विधानसभावार प्रदेश में सीटों का बटवारा देखा जाय तो चारो प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार ही बनती दिखाई पड़ रही है... वहीं प्रदेश की राजनीतिमें कद्दावर माने जाने वाले विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और अजित सिंह की राष्ट्रीय लोक दल को अच्छा खासा झटका लग सकता है...


UP: STATE DIVISON



REGION

BSP

SP

BJP

INC

RLD

OTHERS

TOTAL

BSP(-)

PURVANCHAL

83

43

18

9

0

5

158

75

AVADH

46

40

14

6

0

7

113

67

BUNDELKHAND

29

7

5

5

0

0

46

17

WESTERN UP

48

7

14

2

10

5

86

38

TOTAL

403









वर्त्तमान सीटो के आधार पर दल गत स्थिति


वैसे प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले राज्य विभाजन की बात करना बेमानी ही है क्योंकि संसद का शीतकालीन सत्र और उत्तर प्रदेश का शीत कालीन सत्र लगभग साथ- साथ शुरू होता और विभाजन का यह प्रस्ताव संभवतः संसद के बज़ट सत्र में आएगा तो विधानसभा चुनाव के पहले विभाजन केवल एक परिकल्पना ही लगती है... लेकिन विभाजन के इस नए खेल के साथ मायावती ने उत्तर प्रदेश के बाहर भी राजनीतिक पारी खेलने का मन बना लिया है और और अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को बढ़ाने की इक्षा जाहिर की है और वहीं एक दिलचस्प बात यह देखने को मिलेगी कि वह पार्टी में अन्य लोगों के साथ राजनीतिक सत्ता की लूट साझा करने के लिए तैयार हैं... बहन जी के इस फैसले से पता चलता है कि मायावती ने उत्तर प्रदेश के बाहर अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू कर दिया है, लेकिन केंद्र की राजनीति में पकड़ बनाने में अभी बहुत लम्बा सफ़र तय करना बाकी है क्योकि पुरानी कहावत यह चरितार्थ करती है की "दिल्ली अभी दूर है"... लेकिन निश्चित रूप से देखा जाय तो बहन जी का यह कदम जो की चुनावी लाभ लेने की नीयत से किया गया फैसला है विकास के नजर से इसका स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि साम्प्रदायिकता और जातिवाद से पीड़ित प्रदेश में विकास की राजनीती की शुरुवात है...


अतुल कुमार मिश्र
रिसर्च मैनेजर
इंडिया न्यूज़

नोट - आप लेखक से इंडिया न्यूज चैनल में संपर्क कर सकते हैं.....

Wednesday, September 21, 2011

रफ्तार का रोमांच-इंडियन ग्रांप्री


महज 36 दिनों के बाद हर भारतीय रेसर का सपना पूरा होने जा रहा है। ग्रेटर नोएडा के ग्रेटर नोएडा के बुद्धा इंटरनैशनल सर्किट में रफ्तार के रोमांच का मजा बड़े आराम से कई एक धनाड्य हिंदुस्तानी उठाते नजर आएंगे। करोड़ों - अरबों के वारे न्यारे हो रहे है, इंडियन ग्रांप्री के ट्रैक बनने में करीब 40 करोड़ डॉलर खर्च हुए है। शायद इतने पैसों से भारत के कुछ एक राज्यों के खाने-पीने की समस्या हल हो जाती। लेकिन इस खर्च के बाद जो निकल के आएगा वो वाकई में रोमांच से लबरेज होगा। भारत की तरफ से भाग लेने वाले नारायण कार्तिकेयन और करुण चंडोक से खासी उम्मीदें हैं, ये खिलाड़ी अब तक विदेशों में जाकर इस तरह के आयोजन में भाग लेते थे, पर अब इन्हे अपने घरेलू दर्शकों के बीच जोरआजमाईस करने का मौका मिलेगा। कार्तिकेयन और चंडोक के लिए अपने देश में रेसिंग करना एक सपने को हकीकत में बदलने जैसा है।
इंडियन ग्रांप्री में रफ्तार का आलम ये होगा कि इंडियन ग्रांप्री के ट्रैक पर रेसिंग कारे 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ेंगी। मुकाबला 28 से 30 अक्तूबर के बीच होना है, जिसमें 28 अक्तूबर को प्रैक्टिस मैच, 29 अक्तूबर को क्वालीफाईंग मैच उसके बाद 30 अक्तूबर को होगा फाइनल का संग्राम । टिकट की कीमतें भी खास रखी गई हैं जिसमें 2500 रुपए से लेकर 35 हजार तक है इसके साथ ही यहां पर बॉक्स की भी व्यवस्था की गई है जिसकी कीमत करीब 35 लाख से लेकर 1 करोड़ तक रखी गई है।
ग्रेटर नोएडा के बुद्धा इंटरनैशनल सर्किट अपने आप में खास रेसिंग ट्रैक है। दुनिया का सबसे शानदार रेसिंग ट्रैक बनाया गया है जिसमें दो स्पेशल कार्नर है । भारत के पहले इंटरनैशनल रेसिंग ट्रैक के डिजाइन की एक और जबर्दस्त खासियत है, इस ट्रैक पर ड्राइवर को सामने के टर्न के अलावा आने वाला अगला टर्न भी दिखाई देगा जिससे ड्राइवर को अपनी स्पीड बढ़ाने में मदद मिलेगी।
फार्मूला वन रेस के दौरान एक चीज और खास होने वाली है वो ये है कि इसमें शिरकत करने वाले हर व्यक्ति का चाहे वो ड्राइवर हो या फिर रेस में सहयोग करने वाले स्टाफ हो या फिर देखने वाले दर्शक, सभी का बीमा होगा।
खैर इंडियन ग्रांप्री से जो कुछ निकल के आएगा उससे तो किसी गरीब का भला तो होने से रहा, पर देश के नाम एशियाड,कॉमनवेल्थ के बाद एक और आयोजन कराने का तमगा जुड़ जाएगा। वैसे कॉमनवेल्थ की पोल-खोल से आप पूरी तरह से वाकिफ होंगे लेकिन रफ्तार के इस रोमांच को बनने में ऐसा कुछ नहीं देखने को नहीं मिलेगा क्योंकि यहां पर नौकरशाही और और राजनीति जैसे काले चेहरे नहीं है, कलमाड़ी और भ्रष्ट अफसर नहीं है लिहाजा जहां जितने पैसे लगने हैं उतने ही लगेंगे। इंडियन ग्रांप्री का सारा मैनेजमेंट प्राइवेट कंपनियों के हाथो में है।

आपका
विवेक मिश्रा

Friday, February 18, 2011

रिक्शे की सवारी, बाजारवाद या फिर कुछ और...



विश्व कप के महासंग्राम में करोड़ो अरबों रुपया पानी की तरह बह रहा है, कहीं पर मैदान के बाहर जमकर पैसा खर्च हो रहा है तो कहीं मैदान के बाहर । क्रिकेट के चाहने वाले तो अपनी नजरे टीवी पर गड़ाए बैठे है तो कुछ स्टेडियम में मैच का नजारा लेने के लिए टिकट कटवा रहे हैं, इन प्रशंसको पर विज्ञापनकर्ताओं की नजर लगी हुई है लिहाजा कोई चूक ना हो इसलिए हर जगह विज्ञापन देखने को मिल रहे है।

गेंद और बल्ले की इस महाजंग में दौलत शोहरत और मेहनत तीनों अपने शबाब पर है, लेकिन इस बीच में बंगबंधु स्टेडियम में वर्ल्ड कप के उद्घाटन समारोह में सभी 14 देशों के कप्तान रिक्शे पर नजर आए ये महज इत्तफाक हो सकता है, लेकिन हमारी नजर में ये इत्तफाक ही नही बल्कि कुछ और है। क्रिकेट के ये नामचीन चेहरे जिनके एक कंधे पर टीम का भार है तो दूसरे कंधे पर करोड़ो रुपए के विज्ञापन का बोझ वो रिक्शे पर बैठकर उद्घाटन समारोह में शिरकत करने आए इसके पीछे मामला कुछ औऱ ही है।

भारतीय उपमहाद्वीप में रिक्शे की सवारी कोई नई बात नहीं है, लेकिन बंगबंधु स्टेडियम में इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों के कप्तानों का हाल देखने लायक था। ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पॉन्टिंग असहज महसूस कर रहे थे तो दक्षिण अफ्रीकी कप्तान ग्रेम स्मिथ हैरान थे, इस बीच भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी और बांग्लादेशी कप्तान साकिब अल हसन मंद-मंद मुस्करा रहे थे। खैर इन बातों को छोड़िए मुद्दे की बात ये है कि कप्तान धोनी कितने दिनों बाद रिक्शे पर नजर आए हैं खुद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को भी नहीं पता। मंहगी गाड़ियों से चलने वाले ये कप्तान रिक्शे पर बैठकर स्टेड़ियम में पहुंचे इसके पीछे उन चेहरों का हाथ है जो गांवो शहर की गलियों में झुंडों में बैठकर वर्ल्ड कप का नजारा लेंगे, क्योंकि ये वही दर्शक है जो वर्ल्ड कप को चाव से देखते हैं, इसकी लोकप्रियता को बढ़ाते हैं और रिक्शे पर चलते भी हैं।

विश्व कप में करोड़ो अरबों के वारे न्यारे हो रहे हैं, 43 दिन के इस आयोजन में 3,915 करोड़ रुपये का कारोबार होने का मोटा अनुमान है। 1992 वर्ल्ड कप से ही किक्रेट में बिजनेस की भूमिका अहम हो गई है। वर्ष 2011 किक्रेट से होने वाली कमाई के लिहाज से हाल में सबसे अहम साल है। मनोरंजन इंडस्ट्री के आंकड़ों पर नजर डालें तो किक्रेट वर्ल्ड कप के दौरान कुल 3915 करोड़ रुपए का कारोबार होने की उम्मीद है जो अब तक आयोजित किसी भी आईसीसी टूर्नामेंट के लिए सबसे ज्यादा है। इस टूर्नामेंट में टीवी राइट्स और स्पॉन्सरशिप के जरिए आईसीसी 1500 करोड़ रुपए की कमाई करने वाली है। टिकट ब्रिकी के जरिए 100 करोड़ रुपए तो ट्रेवल एंड हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री 500 करोड़ रुपए का कारोबार करेगी। वहीं टीवी विज्ञापनों पर कुल 600 करोड़ रुपए खर्चे जाने की उम्मीद है। स्टेडियमों के नवीनीकरण पर कुल 1000 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं जबकि खिलाड़ियों के पुरस्कार और मैच फीस के लिए कुल 45 करोड़ रुपए खर्चे जाएंगे। ग्रांउड मार्केटिंग में 120 करोड़ रुपए का कारोबार होना है और किकेट मर्केंडाइज कुल 50 करोड़ की कमाई की उम्मीद है। दुनिया भर में किक्रेट पर निगरानी रखने वाली सर्वोच्च इकाई आईसीसी की कमाई का मुख्य जरिया प्रसारण अधिकार और स्पॉन्सरशिप है। 10 सेकेंड के विज्ञापन के लिए 3.5 लाख रुपये: वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट का फायदा उठाने का मौका कोई भी कंपनी चूकना नहीं चाहती। इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि जहां 2010 में कंपनियों ने अपने मार्केटिंग बजट का 6-8 फीसदी हिस्सा किेट पर खर्च किया था। वहीं 2011 में यह आंकड़ा बढ़कर 10-12 फीसदी होने की उम्मीद है।

चलिए ये तो हो गई खर्चे की बात, जेंटलमैन के इस गेम में अब कुछ भी जेन्टल नहीं रह गया है। सब कुछ बाजारवाद पर निर्भर हो गया है। भारत की भोली-भाली जनता को बरगलाना कोई इन क्रिकेट के सितारों से सीखे, कप्तान धोनी जो कोल्ड ड्रिंक पीते हैं वो जनता पीने के लिए बेकरार रहती है, आम जनता के पसंदीदा खिलाड़ी जो ब्रांड पहनते है उसे जनता पहनना पसंद करती है और क्रिकेट स्टार जो मोबाईल फोन प्रयोग में लाते हैं उसे उसके फैन्स जरुर खरीदते है, तो ऐसे में क्या रिक्शे से बंगु-बंगु स्टेडियम में पहुंचना आम जनता को लुभाना है या फिर वाकई में ये कप्तान अपनी संस्कृति को प्रदर्शित करना चाह रहे है। वैसे भी कप्तान धोनी की कमाई सालाना 50 करोड़ रुपए है जो किसी भी क्रिकेट स्टार की कमाई से ज्यादा है।


विवेक मिश्रा
खेल पत्रकार, इंडिया न्यूज

Saturday, February 5, 2011

वर्ल्ड कप के बदलते रंग....



बड़े कॉलर वाली शर्ट .. बेलबॉटम पैंट .. बड़े बाल और बड़ी मूछें ... और आने वाले बदलाव की सोच लिए इस फटाफट क्रिकेट के महाकुभ को शुरु हुए 36 साल हो चुके है .... इन 36 सालों में ना तो गेंदबाजो और बल्लेबाजो के बीच में छत्तीस का आकड़ा बदला ... ना ही चौको छ्क्को की बारिश बंद हुई .. ना ही क्रिकेट का रोमांच कम हुआ ...और ना ही विरोधी को ध्वस्त करने की कोशिश कम हुई ... बस बदला तो इस खेल को खेलने वाले खिलाड़ियो का स्वरूप ....

1975 में जब पहली बार क्रिकेट का वर्ल्ड कप शरु हुआ तो हम हर टीम के खिलाड़ी को बटन वाली शर्ट जिसकी उपर की चार बटन खुली .. और 22 इंच की मोहरी वाली पैंट आज भी लोगो के जेहन में ताजा है शर्ट पर भले ही एक भी स्पांसर का लोगो ना हो पर ... खिलाड़ियो का अंदाज कम निराला नहीं था ....तब ज्यादातर खिलाड़ी रौबदार मूछों के साथ मैदान पर नज़र आए .. और ये सत्तर के दशक के फैशन का दौर था तब .. और ये फैशन 4 साल बाद भी कायम रहा .. जब 1979 में लगातार इसी तरह के गेटअप और सेटअप के साथ कैरेबियन टीम ने लगातार वर्ल्ड कप पर कब्जा किया ..बस फर्क इतना था कि तब के क्रिकेटर मूछ के बिना अपनी सूझ के जरिए पहचान बनाने की कला समझ चुके थे ...

1983 वर्लड कप में बहुत कुछ बदला ... शर्ट की जगह टीशर्ट ने ले ली थी ..... बैट पर लोगो दिखने लगा था ....और मूछों का चलन फिर लौट आया था .... इन्ही मूछों की करामात ने टीम इंडिया को वर्ल्ड चैंपियन बना दिया था ... कप्तान कपिल समेत ... टीम में सबकी मूछें थी और फिर क्या था कप पर टीम इंडिया का कब्जा ... मूछों का ये प्रचलन .. 1987 में भी रहा .. और फाइनल में दो मूछों वालो कप्तान की भिड़ंत में एलन बार्डर ने कप पर कब्जा किया .. ये वो दौर था जब टीशर्ट पर लोगो और क्रिकेट के मैदान पर पैसे बरसने का दौर शुरु हुआ .....

1992 ..... नब्बे के दशक में क्रिकेट के मैदान पर सबकुछ बदलता नज़र आया ॥ पहली बार वर्ल्ड कप रंगीन कपड़ो में रोशनी के बीच खेला गया ..मूछें गायब हो चुकी थी ... चुस्त टीशर्ट ... बड़े बाल ... बेहतरीन सुविधाए और .. शानदार लुक्स के बीच में पाकिस्तान ने वर्ल्ड कप पर कब्जा किया ... ये वो दौर था जब क्रिकेट खेल एक बड़े बदलाव की तरफ आगे बढ़ रहा था ....कुछ इसी तरह के बदलाव के बीच 1996 में श्रीलंका ने वर्ल्ड कप पर कब्दजा किया ... टीशर्ट पर लोगों .. खेलने की शैली में बदलाव और ढेरो स्पेंसर के बीच बदलने लगा खिलाड़ियों का लुक .... 1999 ... वरर्ल्ड कप में ..में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला .. टीशर्ट पर कुछ लिखने की जगदह नहीं थी .. खिलाड़ी नाम नहीं नंबर से पहचाने जाने लगे .... और बॉल बड़े के बजाए छोटे होने लगे ... ये वो दौर था जब क्रिकेटर्स के बीच में क्रूज कट बहुत लोकप्रिय हुआ ...... ये वो दौर था जब आस्ट्रेलियाई टीम ने वर्ल्ड क्रिकेट पर अपना साम्राज्य स्थापित करना शुरु किया था ... 1999 से 2007 तक यानि 8 साल आस्ट्रेलियाई टीम ने वर्ल्ड क्रिकेट पर राज्यय किया .... इस दौरान .. कभी मूछे आई तो कभी गई ... खिलाड़ी आए भी गए भी ... बस नहीं गया तो फैशन और खिलाड़ियो के बदलते लुक का जमाना ...... अब बात 2011 वर्ल्ड कप की है ... और सबको इंतजार इस वर्ल्ड कप में आने वाले फैशन का है ..... तो तैयार हो जाइए आप भी इस बदलाव का मज़ा उठाने के लिए ...



आपका

विवेक मिश्रा

Friday, January 14, 2011

गणतंत्र के 61 साल...



26 जनवरी 2011 को हम अपना 61 वां गणतंत्र मना रहे है । 26 जनवरी 1950को हमारे देश का संविधान को महान देशभक्तों ने मिलकर बनाया और इसी दिन देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र पसाद ने भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक जन्‍म की घो‍षणा की । 26 जनवरी 1950 को भारत एक पूर्ण गणतंत्र राष्ट्र के रुप में विकसित हुआ । भारत 15 अगस्‍त 1947 को एक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र बना, इसने स्‍वतंत्रता की सच्‍ची भावना का आनन्‍द 26 जनवरी 1950 को उठाया जब भारतीय संविधान प्रभावी हुआ। इस दौरान देश ने बहुत तरक्की की, औद्योगिक क्रांति से लेकर टेक्नोलॉजी में क्रांति बहुत कुछ । देश की तरक्की से आज हम अपने आप को संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल देशों की कतार में खड़े है । अमेरिका, चीन, रुस, जापान जैसी महाशक्तियां भारत को अपने साथ लेकर चल रही है । लेकिन इन सब के पीछे हम उन महान सपूतों, देशभक्तों को कैसे भूल सकते है जिनकी बदौलत हम आज आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे है । सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, लाला लाजपत राय जैसे महान क्रांतिकारियों के बलिदान से हमे आजादी मिली ।
देश को आजादी दिलाने में सरदार भगत सिंह का अहम योगदान है । भगत सिंह में जो देश प्रेम का जज्बा था वो बहुत कम देखने को मिलता है । भगत सिंह जलियाबाग हत्य़ा कांड से प्रेरित होकर क्रांतिकारी बने । महज 24 साल की अवस्था में भगत सिंह हसंते - हसंते फांसी के फंदे को चूम लिए । 23 मार्च 1931 भगत सिंह की शहादत का दिन कोई कैसे भूल सकता है । भगत सिंह ने राजगुरू के साथ मिलकर 17 दिसंबर 1926 लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जेपी सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में भगत सिंह का साथ महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने दिया था । क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने नई दिल्ली की सेंट्रल एसेंबली के सभागार में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिए बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी। भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद गांधी जी ने भगत सिंह को बचाने के लिए पुरजोर कोशिश भी की थी । लेकिन भारत मां के सपूत भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने फांसी के फंदे को चूमना बेहतर समझा । आज भगत सिंह नहीं है लेकिन वो हर भारतीय के जेहन में अभी भी जिंदा है क्योंकि आज हम भारतीय भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों की वजह से आजाद हैं ।
सरदार भगत सिंह के सबसे महत्वपूर्ण साथी चंद्रशेखर आजाद थे । 23 जुलाई 1906 को जन्मे चंद्रशेखर आजाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अत्यंत सम्मानित और लोकप्रिय क्रांतिकारी स्वातंत्रता सेनानी थे । असहयोग आंदोलन समाप्‍त होने के बाद चन्द्रशेखर आजाद की विचारधारा बदली और वो आजादी की जंग में कूद गए । स्वतंत्रता संग्राम में कूदने के बाद आजाद ने काकोरी कांड और सांडर्स हत्या जैसे महान कारनामों को अंजाम दिया । 1919 में जलियावाला बाग हत्याकांड ने चंद्रशेखर को काफी विचलित किया था । 27 फरवीर 1931 को भारतीय क्रांतिकारी इतिहास का प्रलयकांरी दिन था पण्डित चन्द्रशेखर आजाद अल्फ्रेड पार्क में सुखदेव,सुरेन्द्र नाथ पांडे एवं श्री यशपाल के साथ चर्चा में व्यस्त थे। तभी किसी मुखविर की सूचना पर पुलिस ने उन्हें घेर लिया। और वो अंग्रेजों के हाथो लड़ते-लड़ते आखिरी गोली अपने आपको मार कर शहीद हो गए ।
सन् 1928 पंजाब केसरी के नाम से मशहूर लाला लाजपत राय की शहादत के लिए याद किया जाता है । देश के नाम अपने आप को समर्पित करने वाले क्रांतिकारियों में लाला लाजपत राय का भी अहम योगदान रहा है । लाला लाजपत राय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के अगुवा थे । लाला लाजपत राय ने पंजाब नैशनल बैंक और लक्ष्मी बीमा कम्पनी की भी स्थापना की। बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ मिलकर लाला लाजपत राय ने सबसे पहले पूर्ण स्वराज की मांग उठाई, इन तीनों की तिकड़ी को लाल,पाल,बाल के नाम से जाना जाता था । सन् 1928 में महान क्रांतिकारी लाला लाजपत राय ने साइमन कमीशन के विरुद्ध विरोध - प्रदर्शन करते हुए सांडर्स के हाथो लाठी चार्च में घायल होकर शरीर त्यागा।
देश को आजादी दिलाने में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कोई कैसे भूल सकता है । तुम मुझे खुन दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा और जय हिंद का नारा देने वाले महान क्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस तो देश के बाहर अपनी एक सेना तैयार कर ली थी । द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजो से लड़ने के लिए सुभाष चंद्र बोस ने जापान में आजाद हिंद फौज का गठन किया था । जिसका मुख्य मकसद अंग्रेजी साम्राज्य को नेस्तेनाबूत करना था । भेष बदलकर अंग्रेजों को चकमा देना सुभाष चंद्र बोस की आदत थी । नेताजी के देश सेवा का सफर कोलकाता के स्वतंत्रता सेनानी देशबंधु चितरंजन दास की वजह से हुआ, देशबंधु से प्रेरित होकर नेताजी इंग्लैंड से भारत वापस आए । अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाषबाबू को कुल ग्यारह बार कारावास हुआ। सबसे पहले उन्हें 1921 में 6 महिनों का कारावास हुआ। 1938 में कांग्रेस के 41 वें वार्षिक अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस को अध्यक्षता मिली थी । देश के लिए सुभाष चंद्र बोस के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता ।
लौह पुरुष के नाम से विख्यात सरदार बल्लभ भाई पटेल का भी नाम उन स्वतंत्रता सेनानियों की फेहरिस्त में है जो देश के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिए । आजादी से पहले सरदार बल्लभ भाई पटेल की क्रांति ने अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिए थे । स्वतन्त्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला और बडा योगदान खेडा संघर्ष में हुआ। बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिये ही उन्हे पहले बारडोली का सरदार औअर बाद में केवल सरदार कहा जाने लगा। आजादी के बाद पटेल जी ने प्रधानमंत्री पद की दौड से अपने को दूर रखा और इसके लिये नेहरू का समर्थन किया। उन्हे उपप्रधान मंत्री एवं गृह मंत्री का कार्य सौंपा गया।
देश की विडंबना ये है कि हम इन सच्चे देश भक्तों को कभी-कभार ही याद करते हैं । हम ये भूल जाते है कि आज हम इन्ही महान क्रांतिकारियों की बदौलत ही आजाद है । देश के इन सपूतों के योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता ।

आपका
विवेक मिश्रा

Wednesday, May 12, 2010

शतरंज मस्त क्रिकेट पस्त...




दोस्तो नमस्कार.....

दो बातें है एक अच्छी और एक बुरी............पहली ये कि हम एक बार फिर से विश्व चैंपियन हो गये.....जी हां वन मैन ऑर्मी वाले खेल में हम विश्व विजेता बन गये है .....लेकिन वहीं ११ मैन ऑर्मी वाले खेल में हम ढाक के तीन पात हो गये......... जी हां भारतीय शेर कहे जाने वाले धोनी के धुरंधर बड़े ही बुझे मन से स्वदेश वापसी कर लिये है.....ट्वेन्टी - ट्वेन्टी वर्ल्ड कप में टीम इंडिया की शर्मनाक हार हुई है...........लेकिन संतोष देने वाली खबर ये है कि शतरंज में हम अपने शेर के वजह से पूरे विश्व में सिर उंचा किये हुए है.......सोफिया में खत्म हुई विश्व कप में भारतीय जाबांज विश्वनाथन आनंद से बेसलीन तोपालोव को बुल्गारिया के सोफिया में वासेलिन टोपालोव को १२ वीं और अन्तिम बाजी में हरा दिया है.....शतरंज में भारतीय झंडा जहां फहरा रहा है॥वही आईपीएल के वजह से हम साल २००७ के उस याद को फिर से दोहरा नही पाये..... खैर आईपीएल में पार्टी शार्टी का दौर चला लोग मस्ती किये...खुद टीम इंडिया के सेनापति भी मौज मस्ती किये...लेकिन अब वो चेत गये है कि पार्टी खतरनाक है भाई.....




अब हम असली भारतीय शेर यानि विश्वनाथन आनंद की बहादुरी के किस्से बतातें है-------


विश्व चैम्पियनशिप (2000, 2007, 2008 और 2010), विज्क आन जी में कोरस सुपर जीएम टूर्नामेंट (1989, 1998, 2003, 2004, 2006), डार्टमंड (1996, 2000, 2004), कोरसिका मास्टर्स (2000, 2001, 2002, 2003, 2004), मेंज में चेस क्लासिक ( 2000, 2001, 2002, 2003, 2004, 2005, 2006), विश्व कप : 2000, 2002), मलोडी अंबर टूर्नामेंट (1994, 1997, 2003, 2007), रेगियो एमीलिया (1991), लिनारेस (1998, 2007), द क्रेडिट सूइसी मास्टर्स (1997), डोस हेरामनास : (1997)।