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Friday, February 18, 2011

रिक्शे की सवारी, बाजारवाद या फिर कुछ और...



विश्व कप के महासंग्राम में करोड़ो अरबों रुपया पानी की तरह बह रहा है, कहीं पर मैदान के बाहर जमकर पैसा खर्च हो रहा है तो कहीं मैदान के बाहर । क्रिकेट के चाहने वाले तो अपनी नजरे टीवी पर गड़ाए बैठे है तो कुछ स्टेडियम में मैच का नजारा लेने के लिए टिकट कटवा रहे हैं, इन प्रशंसको पर विज्ञापनकर्ताओं की नजर लगी हुई है लिहाजा कोई चूक ना हो इसलिए हर जगह विज्ञापन देखने को मिल रहे है।

गेंद और बल्ले की इस महाजंग में दौलत शोहरत और मेहनत तीनों अपने शबाब पर है, लेकिन इस बीच में बंगबंधु स्टेडियम में वर्ल्ड कप के उद्घाटन समारोह में सभी 14 देशों के कप्तान रिक्शे पर नजर आए ये महज इत्तफाक हो सकता है, लेकिन हमारी नजर में ये इत्तफाक ही नही बल्कि कुछ और है। क्रिकेट के ये नामचीन चेहरे जिनके एक कंधे पर टीम का भार है तो दूसरे कंधे पर करोड़ो रुपए के विज्ञापन का बोझ वो रिक्शे पर बैठकर उद्घाटन समारोह में शिरकत करने आए इसके पीछे मामला कुछ औऱ ही है।

भारतीय उपमहाद्वीप में रिक्शे की सवारी कोई नई बात नहीं है, लेकिन बंगबंधु स्टेडियम में इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों के कप्तानों का हाल देखने लायक था। ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पॉन्टिंग असहज महसूस कर रहे थे तो दक्षिण अफ्रीकी कप्तान ग्रेम स्मिथ हैरान थे, इस बीच भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी और बांग्लादेशी कप्तान साकिब अल हसन मंद-मंद मुस्करा रहे थे। खैर इन बातों को छोड़िए मुद्दे की बात ये है कि कप्तान धोनी कितने दिनों बाद रिक्शे पर नजर आए हैं खुद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को भी नहीं पता। मंहगी गाड़ियों से चलने वाले ये कप्तान रिक्शे पर बैठकर स्टेड़ियम में पहुंचे इसके पीछे उन चेहरों का हाथ है जो गांवो शहर की गलियों में झुंडों में बैठकर वर्ल्ड कप का नजारा लेंगे, क्योंकि ये वही दर्शक है जो वर्ल्ड कप को चाव से देखते हैं, इसकी लोकप्रियता को बढ़ाते हैं और रिक्शे पर चलते भी हैं।

विश्व कप में करोड़ो अरबों के वारे न्यारे हो रहे हैं, 43 दिन के इस आयोजन में 3,915 करोड़ रुपये का कारोबार होने का मोटा अनुमान है। 1992 वर्ल्ड कप से ही किक्रेट में बिजनेस की भूमिका अहम हो गई है। वर्ष 2011 किक्रेट से होने वाली कमाई के लिहाज से हाल में सबसे अहम साल है। मनोरंजन इंडस्ट्री के आंकड़ों पर नजर डालें तो किक्रेट वर्ल्ड कप के दौरान कुल 3915 करोड़ रुपए का कारोबार होने की उम्मीद है जो अब तक आयोजित किसी भी आईसीसी टूर्नामेंट के लिए सबसे ज्यादा है। इस टूर्नामेंट में टीवी राइट्स और स्पॉन्सरशिप के जरिए आईसीसी 1500 करोड़ रुपए की कमाई करने वाली है। टिकट ब्रिकी के जरिए 100 करोड़ रुपए तो ट्रेवल एंड हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री 500 करोड़ रुपए का कारोबार करेगी। वहीं टीवी विज्ञापनों पर कुल 600 करोड़ रुपए खर्चे जाने की उम्मीद है। स्टेडियमों के नवीनीकरण पर कुल 1000 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं जबकि खिलाड़ियों के पुरस्कार और मैच फीस के लिए कुल 45 करोड़ रुपए खर्चे जाएंगे। ग्रांउड मार्केटिंग में 120 करोड़ रुपए का कारोबार होना है और किकेट मर्केंडाइज कुल 50 करोड़ की कमाई की उम्मीद है। दुनिया भर में किक्रेट पर निगरानी रखने वाली सर्वोच्च इकाई आईसीसी की कमाई का मुख्य जरिया प्रसारण अधिकार और स्पॉन्सरशिप है। 10 सेकेंड के विज्ञापन के लिए 3.5 लाख रुपये: वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट का फायदा उठाने का मौका कोई भी कंपनी चूकना नहीं चाहती। इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि जहां 2010 में कंपनियों ने अपने मार्केटिंग बजट का 6-8 फीसदी हिस्सा किेट पर खर्च किया था। वहीं 2011 में यह आंकड़ा बढ़कर 10-12 फीसदी होने की उम्मीद है।

चलिए ये तो हो गई खर्चे की बात, जेंटलमैन के इस गेम में अब कुछ भी जेन्टल नहीं रह गया है। सब कुछ बाजारवाद पर निर्भर हो गया है। भारत की भोली-भाली जनता को बरगलाना कोई इन क्रिकेट के सितारों से सीखे, कप्तान धोनी जो कोल्ड ड्रिंक पीते हैं वो जनता पीने के लिए बेकरार रहती है, आम जनता के पसंदीदा खिलाड़ी जो ब्रांड पहनते है उसे जनता पहनना पसंद करती है और क्रिकेट स्टार जो मोबाईल फोन प्रयोग में लाते हैं उसे उसके फैन्स जरुर खरीदते है, तो ऐसे में क्या रिक्शे से बंगु-बंगु स्टेडियम में पहुंचना आम जनता को लुभाना है या फिर वाकई में ये कप्तान अपनी संस्कृति को प्रदर्शित करना चाह रहे है। वैसे भी कप्तान धोनी की कमाई सालाना 50 करोड़ रुपए है जो किसी भी क्रिकेट स्टार की कमाई से ज्यादा है।


विवेक मिश्रा
खेल पत्रकार, इंडिया न्यूज

Saturday, February 5, 2011

वर्ल्ड कप के बदलते रंग....



बड़े कॉलर वाली शर्ट .. बेलबॉटम पैंट .. बड़े बाल और बड़ी मूछें ... और आने वाले बदलाव की सोच लिए इस फटाफट क्रिकेट के महाकुभ को शुरु हुए 36 साल हो चुके है .... इन 36 सालों में ना तो गेंदबाजो और बल्लेबाजो के बीच में छत्तीस का आकड़ा बदला ... ना ही चौको छ्क्को की बारिश बंद हुई .. ना ही क्रिकेट का रोमांच कम हुआ ...और ना ही विरोधी को ध्वस्त करने की कोशिश कम हुई ... बस बदला तो इस खेल को खेलने वाले खिलाड़ियो का स्वरूप ....

1975 में जब पहली बार क्रिकेट का वर्ल्ड कप शरु हुआ तो हम हर टीम के खिलाड़ी को बटन वाली शर्ट जिसकी उपर की चार बटन खुली .. और 22 इंच की मोहरी वाली पैंट आज भी लोगो के जेहन में ताजा है शर्ट पर भले ही एक भी स्पांसर का लोगो ना हो पर ... खिलाड़ियो का अंदाज कम निराला नहीं था ....तब ज्यादातर खिलाड़ी रौबदार मूछों के साथ मैदान पर नज़र आए .. और ये सत्तर के दशक के फैशन का दौर था तब .. और ये फैशन 4 साल बाद भी कायम रहा .. जब 1979 में लगातार इसी तरह के गेटअप और सेटअप के साथ कैरेबियन टीम ने लगातार वर्ल्ड कप पर कब्जा किया ..बस फर्क इतना था कि तब के क्रिकेटर मूछ के बिना अपनी सूझ के जरिए पहचान बनाने की कला समझ चुके थे ...

1983 वर्लड कप में बहुत कुछ बदला ... शर्ट की जगह टीशर्ट ने ले ली थी ..... बैट पर लोगो दिखने लगा था ....और मूछों का चलन फिर लौट आया था .... इन्ही मूछों की करामात ने टीम इंडिया को वर्ल्ड चैंपियन बना दिया था ... कप्तान कपिल समेत ... टीम में सबकी मूछें थी और फिर क्या था कप पर टीम इंडिया का कब्जा ... मूछों का ये प्रचलन .. 1987 में भी रहा .. और फाइनल में दो मूछों वालो कप्तान की भिड़ंत में एलन बार्डर ने कप पर कब्जा किया .. ये वो दौर था जब टीशर्ट पर लोगो और क्रिकेट के मैदान पर पैसे बरसने का दौर शुरु हुआ .....

1992 ..... नब्बे के दशक में क्रिकेट के मैदान पर सबकुछ बदलता नज़र आया ॥ पहली बार वर्ल्ड कप रंगीन कपड़ो में रोशनी के बीच खेला गया ..मूछें गायब हो चुकी थी ... चुस्त टीशर्ट ... बड़े बाल ... बेहतरीन सुविधाए और .. शानदार लुक्स के बीच में पाकिस्तान ने वर्ल्ड कप पर कब्जा किया ... ये वो दौर था जब क्रिकेट खेल एक बड़े बदलाव की तरफ आगे बढ़ रहा था ....कुछ इसी तरह के बदलाव के बीच 1996 में श्रीलंका ने वर्ल्ड कप पर कब्दजा किया ... टीशर्ट पर लोगों .. खेलने की शैली में बदलाव और ढेरो स्पेंसर के बीच बदलने लगा खिलाड़ियों का लुक .... 1999 ... वरर्ल्ड कप में ..में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला .. टीशर्ट पर कुछ लिखने की जगदह नहीं थी .. खिलाड़ी नाम नहीं नंबर से पहचाने जाने लगे .... और बॉल बड़े के बजाए छोटे होने लगे ... ये वो दौर था जब क्रिकेटर्स के बीच में क्रूज कट बहुत लोकप्रिय हुआ ...... ये वो दौर था जब आस्ट्रेलियाई टीम ने वर्ल्ड क्रिकेट पर अपना साम्राज्य स्थापित करना शुरु किया था ... 1999 से 2007 तक यानि 8 साल आस्ट्रेलियाई टीम ने वर्ल्ड क्रिकेट पर राज्यय किया .... इस दौरान .. कभी मूछे आई तो कभी गई ... खिलाड़ी आए भी गए भी ... बस नहीं गया तो फैशन और खिलाड़ियो के बदलते लुक का जमाना ...... अब बात 2011 वर्ल्ड कप की है ... और सबको इंतजार इस वर्ल्ड कप में आने वाले फैशन का है ..... तो तैयार हो जाइए आप भी इस बदलाव का मज़ा उठाने के लिए ...



आपका

विवेक मिश्रा

Friday, January 14, 2011

गणतंत्र के 61 साल...



26 जनवरी 2011 को हम अपना 61 वां गणतंत्र मना रहे है । 26 जनवरी 1950को हमारे देश का संविधान को महान देशभक्तों ने मिलकर बनाया और इसी दिन देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र पसाद ने भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक जन्‍म की घो‍षणा की । 26 जनवरी 1950 को भारत एक पूर्ण गणतंत्र राष्ट्र के रुप में विकसित हुआ । भारत 15 अगस्‍त 1947 को एक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र बना, इसने स्‍वतंत्रता की सच्‍ची भावना का आनन्‍द 26 जनवरी 1950 को उठाया जब भारतीय संविधान प्रभावी हुआ। इस दौरान देश ने बहुत तरक्की की, औद्योगिक क्रांति से लेकर टेक्नोलॉजी में क्रांति बहुत कुछ । देश की तरक्की से आज हम अपने आप को संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल देशों की कतार में खड़े है । अमेरिका, चीन, रुस, जापान जैसी महाशक्तियां भारत को अपने साथ लेकर चल रही है । लेकिन इन सब के पीछे हम उन महान सपूतों, देशभक्तों को कैसे भूल सकते है जिनकी बदौलत हम आज आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे है । सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, लाला लाजपत राय जैसे महान क्रांतिकारियों के बलिदान से हमे आजादी मिली ।
देश को आजादी दिलाने में सरदार भगत सिंह का अहम योगदान है । भगत सिंह में जो देश प्रेम का जज्बा था वो बहुत कम देखने को मिलता है । भगत सिंह जलियाबाग हत्य़ा कांड से प्रेरित होकर क्रांतिकारी बने । महज 24 साल की अवस्था में भगत सिंह हसंते - हसंते फांसी के फंदे को चूम लिए । 23 मार्च 1931 भगत सिंह की शहादत का दिन कोई कैसे भूल सकता है । भगत सिंह ने राजगुरू के साथ मिलकर 17 दिसंबर 1926 लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जेपी सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में भगत सिंह का साथ महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने दिया था । क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने नई दिल्ली की सेंट्रल एसेंबली के सभागार में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिए बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी। भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद गांधी जी ने भगत सिंह को बचाने के लिए पुरजोर कोशिश भी की थी । लेकिन भारत मां के सपूत भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने फांसी के फंदे को चूमना बेहतर समझा । आज भगत सिंह नहीं है लेकिन वो हर भारतीय के जेहन में अभी भी जिंदा है क्योंकि आज हम भारतीय भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों की वजह से आजाद हैं ।
सरदार भगत सिंह के सबसे महत्वपूर्ण साथी चंद्रशेखर आजाद थे । 23 जुलाई 1906 को जन्मे चंद्रशेखर आजाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अत्यंत सम्मानित और लोकप्रिय क्रांतिकारी स्वातंत्रता सेनानी थे । असहयोग आंदोलन समाप्‍त होने के बाद चन्द्रशेखर आजाद की विचारधारा बदली और वो आजादी की जंग में कूद गए । स्वतंत्रता संग्राम में कूदने के बाद आजाद ने काकोरी कांड और सांडर्स हत्या जैसे महान कारनामों को अंजाम दिया । 1919 में जलियावाला बाग हत्याकांड ने चंद्रशेखर को काफी विचलित किया था । 27 फरवीर 1931 को भारतीय क्रांतिकारी इतिहास का प्रलयकांरी दिन था पण्डित चन्द्रशेखर आजाद अल्फ्रेड पार्क में सुखदेव,सुरेन्द्र नाथ पांडे एवं श्री यशपाल के साथ चर्चा में व्यस्त थे। तभी किसी मुखविर की सूचना पर पुलिस ने उन्हें घेर लिया। और वो अंग्रेजों के हाथो लड़ते-लड़ते आखिरी गोली अपने आपको मार कर शहीद हो गए ।
सन् 1928 पंजाब केसरी के नाम से मशहूर लाला लाजपत राय की शहादत के लिए याद किया जाता है । देश के नाम अपने आप को समर्पित करने वाले क्रांतिकारियों में लाला लाजपत राय का भी अहम योगदान रहा है । लाला लाजपत राय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के अगुवा थे । लाला लाजपत राय ने पंजाब नैशनल बैंक और लक्ष्मी बीमा कम्पनी की भी स्थापना की। बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ मिलकर लाला लाजपत राय ने सबसे पहले पूर्ण स्वराज की मांग उठाई, इन तीनों की तिकड़ी को लाल,पाल,बाल के नाम से जाना जाता था । सन् 1928 में महान क्रांतिकारी लाला लाजपत राय ने साइमन कमीशन के विरुद्ध विरोध - प्रदर्शन करते हुए सांडर्स के हाथो लाठी चार्च में घायल होकर शरीर त्यागा।
देश को आजादी दिलाने में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कोई कैसे भूल सकता है । तुम मुझे खुन दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा और जय हिंद का नारा देने वाले महान क्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस तो देश के बाहर अपनी एक सेना तैयार कर ली थी । द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजो से लड़ने के लिए सुभाष चंद्र बोस ने जापान में आजाद हिंद फौज का गठन किया था । जिसका मुख्य मकसद अंग्रेजी साम्राज्य को नेस्तेनाबूत करना था । भेष बदलकर अंग्रेजों को चकमा देना सुभाष चंद्र बोस की आदत थी । नेताजी के देश सेवा का सफर कोलकाता के स्वतंत्रता सेनानी देशबंधु चितरंजन दास की वजह से हुआ, देशबंधु से प्रेरित होकर नेताजी इंग्लैंड से भारत वापस आए । अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाषबाबू को कुल ग्यारह बार कारावास हुआ। सबसे पहले उन्हें 1921 में 6 महिनों का कारावास हुआ। 1938 में कांग्रेस के 41 वें वार्षिक अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस को अध्यक्षता मिली थी । देश के लिए सुभाष चंद्र बोस के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता ।
लौह पुरुष के नाम से विख्यात सरदार बल्लभ भाई पटेल का भी नाम उन स्वतंत्रता सेनानियों की फेहरिस्त में है जो देश के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिए । आजादी से पहले सरदार बल्लभ भाई पटेल की क्रांति ने अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिए थे । स्वतन्त्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला और बडा योगदान खेडा संघर्ष में हुआ। बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिये ही उन्हे पहले बारडोली का सरदार औअर बाद में केवल सरदार कहा जाने लगा। आजादी के बाद पटेल जी ने प्रधानमंत्री पद की दौड से अपने को दूर रखा और इसके लिये नेहरू का समर्थन किया। उन्हे उपप्रधान मंत्री एवं गृह मंत्री का कार्य सौंपा गया।
देश की विडंबना ये है कि हम इन सच्चे देश भक्तों को कभी-कभार ही याद करते हैं । हम ये भूल जाते है कि आज हम इन्ही महान क्रांतिकारियों की बदौलत ही आजाद है । देश के इन सपूतों के योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता ।

आपका
विवेक मिश्रा

Wednesday, May 12, 2010

शतरंज मस्त क्रिकेट पस्त...




दोस्तो नमस्कार.....

दो बातें है एक अच्छी और एक बुरी............पहली ये कि हम एक बार फिर से विश्व चैंपियन हो गये.....जी हां वन मैन ऑर्मी वाले खेल में हम विश्व विजेता बन गये है .....लेकिन वहीं ११ मैन ऑर्मी वाले खेल में हम ढाक के तीन पात हो गये......... जी हां भारतीय शेर कहे जाने वाले धोनी के धुरंधर बड़े ही बुझे मन से स्वदेश वापसी कर लिये है.....ट्वेन्टी - ट्वेन्टी वर्ल्ड कप में टीम इंडिया की शर्मनाक हार हुई है...........लेकिन संतोष देने वाली खबर ये है कि शतरंज में हम अपने शेर के वजह से पूरे विश्व में सिर उंचा किये हुए है.......सोफिया में खत्म हुई विश्व कप में भारतीय जाबांज विश्वनाथन आनंद से बेसलीन तोपालोव को बुल्गारिया के सोफिया में वासेलिन टोपालोव को १२ वीं और अन्तिम बाजी में हरा दिया है.....शतरंज में भारतीय झंडा जहां फहरा रहा है॥वही आईपीएल के वजह से हम साल २००७ के उस याद को फिर से दोहरा नही पाये..... खैर आईपीएल में पार्टी शार्टी का दौर चला लोग मस्ती किये...खुद टीम इंडिया के सेनापति भी मौज मस्ती किये...लेकिन अब वो चेत गये है कि पार्टी खतरनाक है भाई.....




अब हम असली भारतीय शेर यानि विश्वनाथन आनंद की बहादुरी के किस्से बतातें है-------


विश्व चैम्पियनशिप (2000, 2007, 2008 और 2010), विज्क आन जी में कोरस सुपर जीएम टूर्नामेंट (1989, 1998, 2003, 2004, 2006), डार्टमंड (1996, 2000, 2004), कोरसिका मास्टर्स (2000, 2001, 2002, 2003, 2004), मेंज में चेस क्लासिक ( 2000, 2001, 2002, 2003, 2004, 2005, 2006), विश्व कप : 2000, 2002), मलोडी अंबर टूर्नामेंट (1994, 1997, 2003, 2007), रेगियो एमीलिया (1991), लिनारेस (1998, 2007), द क्रेडिट सूइसी मास्टर्स (1997), डोस हेरामनास : (1997)।

Sunday, May 9, 2010

चकल्लस में मीडिया...


नमस्कार दोस्तों-
मीडिया मीडिया और मीडिया..........हर जगह ये लोग पहुंचे रहते है....बिना बताये और बिना बुलाये....अभी हाल ही में शिरडी में एक घटना घटी...या कहे कि घटना घटा दी गयी...रितिका रोशन मीडिया के दुश्मन बन गये थे...हर न्यूज़ चैनल उनको खलनायक के रूप में पेश कर रहा था.....मीडिया के साथ बदसलूकी का पूरा ठीकरा रितिक रोशन पर फोड़ दिया गया.. पूरा माजरा हम आपको बताते है कि क्या हुआ था उस दिन.....फिल्म अभिनेता रितिक रोशन अपने परिवार के साथ शिरडी के सांई बाबा के मंदिर में दर्शन करने गये थे...जो कि वो हमेशा किसी भी फिल्म के रिलीज होने के पहले करते है....ऐसा इस बार भी किये..लेकिन घटना ये घटी कि बिना बुलाये मेंहमान वहां भी पहुंच गये....फिर क्या होना था...वही जो बिना बुलाये मेहमान करते है...धक्का मुक्की का दौर चला...और इल्जाम लगा रितिक रोशन पर...रितिक को कहा गया कि वो फिल्म के पब्लिसिटी के लिये इस तरीके की हरकत कर रहे है..जबकि रितिक ने ट्विटर पर लिखे कि ये उनका निजी दौरा था जिसमें वो मीडिया को मना कर रहे थे लेकिन मीडिया ने नहीं माना और उनका फोटो खीचने लगें...जिसकी वजह से ये सारा मामला हो गया...अब रितिक रोशन को भी समझना चाहिये कि शिरडी के सांई बाबा उनके अकेले तो है नही...मीडिया ने बकायदा मंदिर प्रशासन से अनुमति लेके मंदिर में प्रवेश किया था....खैर ऐसे मौको पर मीडिया ताक में रहती है कि कोई घटना ऐसी हो जाये जिससे उनको मशाला मिल जाये...भाई मीडिया के बारे में जहां तक मै जानता हूं वहां एक बात सामने निकल के आती है..वो बात ये है कि रिपोर्टर जब भी किसी ख़बर के लिये ऑफिस से निकलता है तब उसका मेन मोटो यही होता है कि कोई ब्रेकिंग मिल जाये नहीं तो बना ली जायेगी क्योंकि बॉस की तारीफ जो बटोरनी है...इन रिपोर्टर लोगो को ये पता होना चाहिये कि वो इन सस्ती टीआरपी के चक्कर में जो काम करते है उससे सामने वाले के दिल पर क्या बीतती है....न्यूज़ चैनल वालो के लिये सबसे बड़ी खबर वॉलीवुड से होती है...अगर मुंबई में किसी कलाकार को छींक आ गयी तो ये लोग पूरे मुंबई के तापमान का पोस्टमॉर्टम कर देंगे....लेकिन अगर उड़ीसा या फिर झारखंड में किसी नक्सली का कहर टूटेगा तो ये उस ख़बर को महज टिकर में अपडेट कर देते है......खैर रितिक रोशन जैसा मामला खली और कुछ दिन पहले टीम इंडिया के स्पिनर हरभजन सिंह के साथ हुआ.....अब देखने वाली बात ये होगी कि कभी सच्चाई को सामने लाने की मुहिम में लगी मीडिया अपने पुराने अस्तित्व में कब लौटेगी ।

आपका
विवेक मिश्रा

Monday, April 19, 2010

जानलेवा मोहब्बत...



एकखबर पढ़ने में आई कि जितने लोगों की जान गरीबी और बेरोजगारी ने नहीं ली उससे ज्यादा मोहब्बत ने ली है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक ही दिन दो प्रेमी युगलों ने खुदकुशी कर ली। इनकी चिता की आग अभी बुझी भी नही थी कि ग्रेटर नोएडा में भी एक प्रेमी युगल ने सल्फास खाकर आत्महत्या कर ली। बताया गया कि इन लोगों ने पारिवारिक लोगों की नाराजगी और परेशानियों की वजह से खुदकुशी कर ली। तीन दिन में प्रेमी युगलों की खुदकुशी की ये तीसरी घटना है। यह हमारे सामाजिक ढांचे और व्यवस्था पर सवाल उटाती है । आखिर प्रेम करनेवालों को खुदकुशी क्यों करनी पड़ती है? क्या उन्हें यह दुनिया अपने प्रेम के लिए रास नहीं आती या दुनिया ही उनके प्रेम को बर्दास्त नहीं कर पाती? कहनेवाले तो कहते हैं कि यह दुनिया किसी शेषनाग के फन पर नहीं, प्रेम से चलती और संवरती है। प्रेम गली अति सांकरी तो हमेशा से ही रही है और यह कोई खाला का घर भी नहीं हैं। प्रेम को पाने के लिए शीश उतारें भूंई धरे की स्थिति से गुजरना पड़ता है या आग का दरिया पार करना पड़ता है। प्रेम का दुश्मन जमाना शुरू से ही रहा है। फिर भी प्रेम करने वाले हैं कि रोके नहीं रुकते, वे प्रेम करते हैं और दुनिया भर की तमाम दुश्वारियां झेलते हुए खुद को होम कर देते हैं। लेकिन आज के आधुनिक समय में भी जब प्रेम करनेवाले को अपनी जानदेनी पड़े तो यह हमारे समाज-व्यवस्था के लिए शर्म की बात है।
हमारा समाज अपनी सामंती मानसिकता के कारण इन प्रेमी युगलों के प्रेम को मान्यता नहीं देना चाहता है और इन्हें तरह-तरह से लांछित करना चाहता है।इनके राह में सौ रोड़े अटकाता है। समाज के बेगाने रवैये से प्रेमीजनों को लगता है कि यह दुनिया उनके रहने लायक नहीं रह गई है। शायद दूसरे लोक में ही उनका मिलन संभव है। इसलिए अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद मिले सुसाइड नोट में यह लिखा मिलता है कि-साथ जी न सके लेकिन साथ मर तो सकते हैं- या दूसरी दुनिया में हम साथ-साथ रहेंगे, इसलिए यह दुनिया छोड़कर जा रहे हैं। इन प्रेमी युगलों को लगता है कि जिस दुनिया , जिस समाज और जिस परिवार में उनके प्यार की कोई कद्र नहीं उसमें क्यों जीना? और वे इस दुनिया के खिलाफ अपना प्रतिरोध दर्ज करने के लिए खुदकुशी का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं।
आखिरप्रेम करनेवालों का दुश्मन जमाना क्यों रहा है? क्योंकि प्रेम सामाजिक रूढ़ियों और उसकी व्यवस्था को चुनौती देता है। दरअसल हमारे समाज में पारिवारिक ढांचा आज भी सामंती किस्म का है। परिवार अपने पुराने मूल्यों और पुरानी नैतिकताओं के मानदंड पर ही टिका रहता है। प्रेम और शादी के मामले में वो चाहता है कि सबकुछ उनके मन के मुताबिक हो। इस मामले में वो बच्चों को कोई छूट नहीं देना चाहता। अपने बच्चों के लिए दुनिया भर की नेमतें हासिल करने को उत्सुक माता-पिता प्रेम और विवाह के मामले में अपनी ही पसंद, अपनी ही जिद पर अड़े रहना चाहता है। खाप पंचायतों का फरमान इसका ज्वलंत उदाहरण है। खाप पंचायतों के फरमान के कारण न जाने कितने प्रेमी युगलों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। लेकिन आज के युवा इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। वे दुनिया की तमाम हलचलों से पल-पल वाकिफ रहते हैं। सूचना क्रांति ने उन्हें न केवल अपने नागरिक जीवन के अधिकारों से अवगत कराया है बल्कि समाज की दकिनूसी परंपराओं से लड़ने का होसला भी दिया है। आज के युवा अपने अधिकारों के लिए सजग हैं और प्रेम या विवाह जैसे मसलों को अपना निजी मामला समझते हैं। इसमें वे किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहते। उन्हें पता है कि प्रेम निजी मामला है और संविधान की धारा इक्कीस के तहत यह उनके जीने की स्वतंत्रता का अधिकार है। लेकिन माता-पिता अपने बच्चे के विवाह को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते हैं। वे अपने बच्चे को प्रेम के संक्रमण से बचाने के लिए साम-दाम, दंड-भेद जैसे तमाम हथकंडे अपनाते हैं।
यहांसवाल ये भी उठता है कि क्यों नहीं माता-पिता अपने बच्चों के मन की भावनाओं को समझ पाते हैं? इसके पीछे भी तथाकथित नाक के कटने की मानसिकता काम करती है। हमारे समाज में जाति, वर्ग और सामाजिक रुतबे को खतरनाक हद तक मान्यता मिली हुई है। लेकिन पश्चिमी देशों में ऐसा नहीं है। वहां व्यक्ति स्वातंत्र्य को तरजीह दी जाती है। सांवैधानिक रूप से समय के साथ हरेक समाज के मूल्यों में परिवर्तन होता रहता है। लेकिन हमारा समाज आज भी सदियों पुरानी नैतिकताओं और मूल्यों पर टिका हुआ है। अठारह वर्ष के युवा को सांवैधानिक रूप से आज देश का शासक चुनने का अधिकार प्राप्त है लेकिन यह विडबंना है कि हमारा समाज उसे अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार नहीं देना चाहता है। जब एक युवा अपने मन से देश के लिए योग्य नेता का चुनाव कर सकता है, अपने रोजगार और कैरियर का चुनाव कर सकता है तो अपने जीवन-साथी का चुनाव क्यों नहीं कर सकता? नहीं, दरअसल समाज के लिए मामला इन युवाओं के अधिकार को , उनके चुनाव की स्वतंत्रता को महत्व देने का नहीं है उन्हें अपनी तथाकथित नैतिकता और पुराने पड़ चुके मूल्यों की चिंता है। अपनी नाक बचाने की चिंता में वे बचपन के ही बच्चों के जीवन को कुंठित करने और अपने ढंग से आकार देने में लग जाते हैं और तरह-तरह के प्रतिबंध लगाते रहते हैं। लेकिन जहां बंदिशें ज्यादा रहती हैं वहीं प्रेम का बिरवा उगता है।
दूसराकारण हमारे समाज में स्त्री को, लड़कियों को वस्तु समझने का भी है। माता-पिता अपनी बेटियों को इज्जत समझते हैं और उसकी यौन शुचिता को लेकर चिंतित रहते हैं। यही कारण है कि वे उसे अपने मनपसंद युवक से ब्याह नहीं करने देना चाहते और दहेज देकर या बिना दहेज के दुहाजू वर के साथ जिंदगी भर के लिए बलात्कर भुगतने को अभिशप्त करते हैं। दुखद बात ये कि यह सब उस लड़की की भलाई के नाम पर किया जाता है।
जबतकहमारे समाज की मानसिकता में आधुनिक मूल्यों की प्रतिष्ठा नहीं होगी तब तक इस तरह के वारदात होते रहेंगे और प्रेमीजन अपनी जान कुर्बान करते रहेंगे।लेकिन यही इस मामले का सबसे दुखद पहलू है। जिन्हें इस समाज को जीने और प्रेम करने लायक बनाना चाहिए था वही इसे छोड़कर चले जाते हैं। यह सच है कि समाज उनके अधिकार की रक्षा नहीं करता लेकिन यह भी उतना ही सच है कि वे भी समा को सुंदर बनाने के अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ जाते हैं। क्यों कि किसी भी समाज की बेहतरी की िम्मेदारी सबसे ज्यादा युवाओं के कंधों पर ही होती है। दुनिया की दुश्वारियों से हारकर खुदकुशी करने को किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता है। आत्महत्या चाहे जिन परिस्थितियों में की गई हो उसे कायरता ही माना जाएगा। जरूरत है कि समाज अपनी मान्यताओं और नैतिकता के मानदंड को आधुनिक बनाए तथा युवा वर्ग भी अपने इस समाज के डर से भागें नहीं बल्कि इसे बदलने की कोशिश करें। इस समाज में रहकर ही प्रेमीजन समाज के पुराने मूल्यों और रूढ़ परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं, इससे भागकर नहीं।


रमण कुमार सिंह


लेखक- एक पत्रकार, साहित्यकार और कवि है...अगर आप जुड़ना चाहते है तो...इनके मेल आईडी kumarramansingh@gmail.com पर संपर्क कर सकते है....

आईपीएल मतलब गड़बड़घोटाला...




नमस्कार दोस्तो..
पूरे डेढ़ महीने तक चला आईपीएल का सफर अब आईपीएल खत्म होने के कगार पर है...लेकिन इन दिनों के बीच सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात ये है कि आईपीएल में क्रिकेट से बढ़कर विवाद ज्यादा बिका...आखिरी समय में तो मोदी और थरूर की जंग नें तो आईपीएल का सारा काला चिट्ठा ही खोल के रख दिया...मोदी जहां सुनंदा नाम की सुंदरी का सहारा ले रहे थे॥वहीं थरूर साउथ अफ्रीकी मॉडल गैब्रिएला के दामन को पकड़े थे... हां एक बात जरूर देखने को मिली, कि मोदी के कार्यालय में आयकर विभाग का छापा पड़ा तो ढ़ेर सारे दस्तावेज मिले जो कि मोदी के विपरीत जाते है....कुछ लोगो के मुताबिक क्रिकेट...क्रिकेट नही रह गया है...क्रिकेट बन गया है जुआ.. जी हां सुनंदा पुष्कर जैसे लोग इस जुए में पैसा लगाती है जिसका फल उनको दुगुना होता है...इस पूरे प्रकरण के बाद शशि थरूर को अपना विदेश राज्य मंत्री पद की कुर्बानी देनी पड़ी..जबकि ललित मोदी पर गाज गिरनी बाकी है....



ललित मोदी के बारे में...
ललित मोदी को आईपीएल के तीनो सीजन को सफलता पूर्वक चलाने का खिताब जरूर मिलना चाहिये....क्योंकि ये वही ललित मोदी है जो पिछले साल सुरक्षा को लेके गृहमंत्री पी. चिदंबरम का विरोध करके इस क्रिकेट के जुए को साउथ अफ्रीका में सफलता पूर्वक खेलवाये....वाकई में मोदी जी आप बधाई के पात्र है..लेकिन अगर आपके पैसे पर गौर फरमायें तो निकल के आता है कि....इन तीन सालो में आपके पास हर वो नई चीजे दिखी है जो एक अरबपति के पास होना चाहिये...ए दिगर की बात है कि आप खुद रईसो के श्रेणी में आते है..आपके पास ढ़ेरों कंपनिया है..लेकिन इन तीन सालो में आपके गैरेज में BMW, मर्सिडीज और प्राईवेट प्लेन जरूर बढ़े है..भाई मोदी साहब हर साख पे उल्लू बैठा है...आप जो पैसा इंडियन प्रीमियर लीग में बना रहे थे....उस पर सरकार की नज़र 2009 से ही लगी हुई थी...अभी तो और खुलासे बाकी है..देखने वाली बात ये होगी कि जेन्टलमैन वाले खेल क्रिकेट को जुआ बनाने वाले ये मोदी जैसे लोगों के पर कब कतरे जायेंगें.....

आपका
विवेक मिश्रा